बुधवार, 24 फ़रवरी 2016

आत्म कथा - दो



अपने साथ
                                         देवेन्द्र कुमार
पिता नहीं थे और माँ को जबरदस्ती मुझसे दूर कर दिया गया था.अब वह कभी मेरे पास वापस आने वाली नहीं थीं. मेरे उदास अकेलेपन में किताबें मेरी दोस्त बन गईं, लेकिन स्कूली किताबों से अलग थीं मेरी दोस्त पुस्तकें. मैं स्कूल से बचता था . गणित के मास्टरजी बहुत पिटाई करते थे. स्कूल के रास्ते में अनाथालय की लायब्रेरी मुझे  अंदर बुला लेती थी. वहां रोटी के साथ डंडे खाने वाले बच्चे उस दिन कोई खेल कर रहे थे. और फिर मैं भी उसमें शामिल  हो गया.

(प्रथम क़िस्त = पृष्ठ 1 से 13) अब आगे पढ़ें -------------
आत्म कथा- 2    
        कहीं और जाने की योजना फेल हो गई थी। मेरी पहली पसंद थी अनाथालय वाली लाइब्रेरी. बस्ता कंधे पर लटकाए मैं अनाथालय का बड़ा फाटक पार करके उसके लंबे चौड़े आंगन में जा खड़ा हुआ। न जाने क्यों आज वहां एकदम खामोशी थी। अनाथालय का दफ्तर भी बंद था। हरना बाबा ने वहीं मैनेजर के साथ बातें की थीं। फिर बाद में अनाथालय में रहने वाले बच्चों को पूरियां खिलाई थीं।
आंगन में बहुत सारे                 बूतर फड़फड़ करते नीचे उतरते, गुटरगूं करते, फिर उड़ जाते। ऐसा वे लगातार कर रहे थे। आंगन के फर्श पर दाने नहीं बिखरे थे पर कबूतर फिर भी वहां फुदक रहे थे। शायद वहीं रहते थे कबूतरों के झुण्ड। लायब्रेरी के बड़े-बड़े दरवाजे भी बंद थे। मैं चबूतरे पर चढ़कर दरवाजों के एकदम पास जा खड़ा हुआ। वे वाकई बंद थे।
वैसे तो लायब्रेरी रोज खुलती थी-इतवार को भी। एक इतवार को मैंने आकर देखा तो पाया अखबारों वाली लंबी मेज के दोनों तरफ पढ़ने वालों की भीड़ जमा थी। वहां वैसा ही शोर था जैसा हमारी गली वाली लायब्रेरी में होता था। फिर भी दोनों में एक बड़ा फर्क था। गली वाली लाइब्रेरी में बैठने की जगह न होने पर भी सुबह शाम बहुत से पढ़ने वाले रोज आते थे। पर अनाथालय वाली लायब्रेरी में तो ऐसा मैंने बस रविवार को ही देखा था।
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तभी सट् सट् की आवाजें सुनकर मैं घूम पड़ा। कहीं ऐसा तो नहीं अनाथालय का दाढ़ी वाला मैनेजर उस दिन की तरह आज भी किसी बच्चे को छड़ी से पीट रहा हो। लेकिन नहीं! फड़फड़ करते, उड़ते-उतरते कबूतरों के बीच दो बच्चे बैठे दिखाई दिए.  वे जोर-जोर से हंसते हुए न जाने क्या कर रहे थे। मैं चबूतरे से उतरकर उनके पास जा खड़ा हुआ। पर उन्होंने मेरी ओर कोई ध्यान नहीं दिया। वे अपने काम में लगे रहे। लेकिन कैसा काम ! अब मेरा ध्यान गया- जमीन पर एक स्लेट पड़ी थी। उस पर अपने हाथ की छड़ी से रह-रहकर वार करते हुए हंस रहे थे दोनों। बीच-बीच में कहते थे-और ले...और ले...हरामी।छड़ी की हर चोट से स्लेट हवा में उछलकर दूर जा गिरती थी। कैसा अजीब खेल चल रहा था यह।
मैंने ध्यान से देखा-स्लेट पर चाक से एक आकृति बनी हुई थी। एक गोल चेहरा। ठोढ़ी पर दाढ़ी। अब सब समझ में आ गया। तो यह बात थी। इस तरह वे दाढ़ी वाले मैनेजर पर अपना गुस्सा निकाल रहे थे। न जाने क्यों मुझे शरारत सूझी, मैंने कहा, ‘‘दाढ़ी वाला आया...’’
इन शब्दों में जैसे जादू था। पलक झपकते ही हाथ की छड़ी फेंककर दोनों फुर्र हो गए। वे लायब्रेरी वाले चबूतरे की तरफ भागे थे। गुटरगूं करते कबूतरों के बीच स्लेट और छड़ी पड़ी रह गईं।
उन दोनों के यों भाग जाने पर मुझे हंसी आ गई। अनाथालय के सभी बच्चे दाढ़ी वाले से क्यों डरते थे यह मैंने उस दिन हरना बाबा के साथ वहां आकर खूब देखा था।
मुझे लगा जैसे उनके इस खेल में मैं भी शामिल हो गया हूं। वैसे भी लायब्रेरी बंद रहने के कारण मेरे पास भी कोई काम नहीं था। मैंने उन दोनों को लायब्रेरी वाले चबूतरे पर चढ़कर गायब होते देखा था।
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 मैं पैर दबाता हुआ चबूतरे पर जा पहुंचा। तभी जैसे आंधी सी आई-दोनों तरफ से आकर वे दोनों मुझसे लिपट गए और मुक्के बरसाने लगे। सब कुछ इतनी जल्दी हुआ था कि मैं संभल ही न पाया। वैसे भी कमर पर बस्ता लटका रहने के कारण मैं कुछ कर नहीं पा रहा था। बस्ते का फीता टूट गया। एक ने उठाकर बस्ते को दूर फेंक दिया। नानी का दिया नाश्ते का डिब्बा टन-टन करता दूर लुढ़क गया। उसमें रखी मिठाई बाहर गिर गई। बस्ते में रखी कापियां-किताबें यहां-वहां बिखर गईं। मैं पिट रहा था, पर फिर भी उन दोनों पर गुस्सा नहीं आ रहा था। आखिर कसूर तो मेरा ही था। मैंने ही तो दाढ़ी वाला आयाकह कर उन्हें एकदम चौंका दिया था। पर अब अपने को तो बचाना ही था, नहीं तो वे मुझे मारते ही जाने वाले थे। मैंने कहा-‘‘ठीक है, मैं बाबा के साथ आकर दाढ़ी वाले से शिकायत करूंगा तुम दोनों की। मेरे बाबा अक्सर उसके पास आते हैं।’’
एक बार फिर जादू हुआ। लात-घूंसों की बौछार रुक गई। उन दोनों ने मेरे हाथ पकड़ कर मुझे खड़ा कर दिया और मेरे कपड़ों पर लगी धूल झाड़ने लगे। पूरे बदन में दर्द हो रहा था। हाथों पर जगह-जगह खून झलक आया था। अब वे दोनों मेरे बस्ते में किताबें-कापियां लगा रहे थे। फिर उनमें से एक जमीन पर पड़ी मिठाई को डिब्बे में रखकर उसे बंद करने लगा।
अब वे इस तरह सिर झुकाए खड़े थे जैसे कह रहे हों-‘‘लो अब तुम्हारी बारी है। मार लो जितना चाहो।’’
‘‘दाढ़ी वाले से शिकायत मत करना भैया।’’ एक बोला।
‘‘तो तुमने मुझे मारा क्यों?’’
‘‘तुमने हमारा खेल जो बिगाड़ा था।’’ उन दोनों ने कहा। ‘‘हम उसे और मारते, शाम तक, रात तक...’’वे गुस्से से बोल रहे थे।
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वे ठीक ही कह रहे थे, मैंने ही उन्हें दाढ़ी वाले का नाम लेकर डराया था। उनका मुझ पर झपटना गलत नहीं था। लेकिन यह बिगड़ा हुलिया लेकर अब मैं भला कहां जा सकता था। कम से कम नानी के पास तो एकदम नहीं। नानी के किसी भी सवाल का जवाब मेरे पास नहीं था, हो भी नहीं सकता था। मुझे रोना आ गया। मेरी नानी कितनी अच्छी थीं और मैं...लेकिन फिर उन पर एकदम गुस्सा भी चढ़ आया। आखिर यह नानी ही तो थीं जिन्होंने मां को मुझसे दूर, बहुत दूर भेज दिया था।
फिर ध्यान आया मैं घर में नानी के सामने नहीं, अनाथालय में खड़ा हूं और अभी-अभी खूब मार खाई है।
मैं किताबें-कापियां संभालने लगा तो एक लड़का बोला, ‘‘लो अपनी मिठाई खा लो। हमने सारी डिब्बे में रख दी है, एक भी टुकड़ा नहीं खाया है।’’
‘‘अब मैं नहीं खाऊंगा, तुम्हीं खा लो।’’ कहते हुए मैंने डिब्बा बस्ते से निकालकर एक लड़के के हाथ में थमा दिया।
इसके बाद उन्होंने मुझसे कुछ नहीं पूछा। दोनों डिब्बा खोलकर मिठाई खाने लगे। मिठाई खत्म होते-होते आखिरी टुकड़े पर दोनों में नोक-झोंक शुरू गई। अब दोनों आपस में लड़ रहे थे। एक का कहना था कि दूसरे ने ज्यादा मिठाई खाई है।
‘‘आज लायब्रेरी बंद क्यों है?’’ मैंने पूछ लिया।
‘‘सुना है कोई मर गया है। इसीलिए सब कुछ बंद है। आज तो ऊपर खाना भी नहीं मिलेगा।’’ वे ऊपर अनाथालय की ओर संकेत कर रहे थे। ‘‘कोई मरा है, तभी तो गया है दाढ़ी वाला, नहीं तो यहीं बना रहता।’’ वे सचमुच दाढ़ी वाले मैनेजर से बहुत नाराज थे। मुझे लगा मैं कभी नानी को भी यहां ला सकता हूं। बच्चों को यों पिटता हुआ देखकर नानी तो सचमुच रो पड़ेंगी। कोई ताज्जुब नहीं इन्हें रोज मारने वाला नानी के हाथों से पिट भी जाए। वैसे आज तक मैंने उन्हें किसी पर हाथ उठाते हुए नहीं देखा था। हां, मुझे कभी-कभार एकाध थप्पड़ मारती थीं लेकिन उसके बाद देर तक रोती भी रहती थीं। क्या अनाथालय का मैनेजर भी बच्चों को छड़ी से पीटने के बाद नानी की तरह रोता होगा?
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अगर नानी फैसला कर लें तो ये बच्चे हमारे घर में रह सकते थे। हमारा मकान काफी बड़ा था। और मैं देखता था कि किसी के कुछ न करने पर भी हम सभी को दोनों समय खाना मिल जाता था। पास-पड़ोस वाले नानी को सेठानी कहा करते थे। इस पर वह धीरे से मुस्करा कर रह जाती थीं। न जाने क्यों मुझे लग रहा था कि अगर नानी चाहें तो अनाथालय के ये बच्चे हमारे घर में मजे से रह सकते थे। कम से कम तब कोई छड़ी से इनकी पिटाई तो नहीं करेगा। और फिर मैं भी इतना अकेला नहीं रहूंगा कि कई-कई दिन तक कोई साथ खेलने वाला ही न मिले। हम सब मिलकर पढ़ भी सकेंगे। तब न हमारे गणित मास्टर जयमल सिंह होंगे और न अनाथालय का छड़ी वाला मैनेजर।
पर ज्यादा सोचना न हो सका। तभी अपना नाम कानों में पड़ा-‘‘दीबू! अरे दीबू।’’ हां, एक ही थे जो मुझे इस तरह पुकारते थे। बाकी तो सब देवन ही कहते थे। मैंने देखा अनाथालय के दरवाजे से कोई अंदर चला आ रहा था। मैं उन्हें बिना देखे ही जान गया था। वह थे राघव।
राघव कौन थे यह मैं नहीं जानता था। वह हमारे घर में कभी नहीं आते-जाते थे। लेकिन बाहर सड़क पर दूर से ही आवाज लगाते थे-‘‘ओ दीबू, सुन तो।’’ फिर प्यार से मेरी कौली भरते हुए पूछते थे-‘‘कैसा है रे तू! तेरी नानी और पड़नानी कैसी हैं।’’ वह आगरे वालों और सुजानी भाभी के बारे में भी जैसे सब कुछ जानते थे। एक बार मैंने नानी से पूछा था-’’नानी, यह राघव कौन है?’’
सुनकर नानी बड़ी-बड़ी आंखों से कुछ पल मुझे घूरती रही थीं। फिर कंधा पकड़कर जोर से बोली थीं-‘‘होगा कोई, तू कैसे जानता है उसे।’’ चश्मे के पीछे से नानी की बड़ी आंखें देखकर मैं तो डर ही गया था। पर मैं समझ गया था नानी राघव को पसंद नहीं करतीं। उनसे पूछने की हिम्मत न हुई, पर राघव के बारे में सोचता जरूर था, क्योंकि वह अक्सर ही मुझे गली-बाजार में दिखाई दे जाते और फिर देर तक बातें करते रहते थे। जब तक मुझसे बात करते मेरा कंधा थामे रहते। मैं चाहकर भी उनसे अपने को छुड़ा न पाता।
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मैं चाहता था राघव मुझे न देख पाएं। पर देख तो उन्होंने लिया ही था। वह तेजी से मेरे पास आ गए, फिर बोले-‘‘दीबू, यहां क्या कर रहे हो। स्कूल नहीं गए!’’ और फिर मेरा हुलिया देखकर झट से कह उठे-‘‘अरे, यह क्या हाल बना रखा है।’’ मेरे बदन को जल्दी-जल्दी छू-छू कर देख रहे थे। मैंने देखा वह परेशान हो उठे थे। भला वह क्यों परेशान हो रहे थे मेरे लिए, जबकि नानी तो उन्हें पसंद नहीं करती थीं।
मैं भला क्या जवाब देता। मुझसे मारपीट करने वाले दोनों शैतान मिठाई खाकर रफूचक्कर हो गए थे। रह गए थे आंगन में उड़ते-बैठते कबूतर जो बिना रुके यह किए जा रहे थे, पता नहीं क्यों? मुझे जल्दी से कोई बहाना सोचना था जिसे मैं बता सकूं। फिर एकदम सूझ गया। मैं बोला- ‘‘मुझे हरना बाबा ने यहां भेजा था।’’
‘‘क्यों?’’
‘‘उन्हें अनाथालाय में बच्चों को खाना देना है। इसलिए पूछने आया था।’’ यह झूठ था। मैंने राघव को कभी अपनी गली से आते-जाते नहीं देखा था। हां, बगल वाली दूसरी गली में उन्हें कई बार देखा था मैंने। आखिर किसने रोका था उन्हें हमारी गली में आने से।
एकाएक उन्होंने मेरी कलाई पकड़ ली। बोले, ‘‘चलो तुम्हें तुम्हारे घर छोड़ आऊं।’’ पर इतना कहने के बाद कलाई से हाथ हटा भी लिया। बोले-‘‘मैं भला तुम्हारे घर में कैसे जा सकता हूं। वहां तो मुझे कोई घुसने भी नहीं देगा। कभी नहीं...लेकिन मैं तुम्हें अपने घर तो ले ही जा सकता हूं। चलो, घाव साफ करके दवाई लगा दूं, फिर तुम अपने घर चले जाना। जानता हूं तुम्हें इस हालत में देखकर तुम्हारी नानी बहुत घबरा जाएंगी।’’
मैं उनके साथ नहीं जाना चाहता था। लगा जैसे नानी कान में कह रही हों, ‘‘कभी नहीं, बिल्कुल नहीं।’’ मैंने कहा-‘‘मैं घर जा रहा हूं-नानी दवा लगा देंगी। मैं यहां चौक में फिसल गया था इससे चोट लग गई। मैं ठीक हूं।’’
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पर मेरी एक न चली। एक बार छोड़ने के बाद राघव ने फिर से मेरी कलाई कसकर पकड़ ली और जैसे जबरदस्ती मुझे अपने साथ ले चले। पता नहीं कहाँ ले जाएंगे मुझे? यह सोच-सोचकर मन घबराने लगा। आज तो सारा प्रोग्राम ही गड़बड़ा गया था।                                                                      
पर राघव जैसे मेरे मन में बैठा डर पहचान गए। बोले-‘‘डरो मत, मैं तुम्हारे घर के एकदम पास वाली गली में रहता हूं। घर में मुझे सब जानते हैं। चलो इसी चोट के बहाने से सही, कम से कम तुम मेरे घर में तो जाओगे। मैं कब से चाहता हूं, तुम्हें अपने पास बैठाकर बातें करूं।’’
मैं चौंक उठा। आखिर कौन-सी बातें करना चाहते हैं राघव मेरे साथ। सच तो यह है कि मैं उनके बारे में कुछ भी नहीं जानता था, पर उन्हें जैसे मेरे बारे में हर बात पता थी।
कोई उपाय नहीं था, मैं जैसे घिसटता हुआ-सा उनके पीछे-पीछे चलता गया था। हालांकि मेरी कलाई उनकी मुट्ठी में थी, पर थोड़ी दूर चलने के बाद वह मुड़कर मेरी ओर यों देखते थे जैसे मैं कहीं चला तो नहीं गया। उनका यह व्यवहार मुझे अजीब लग रहा था। समझ में नहीं आ रहा था कि अब मेरे साथ क्या होने वाला है?
दो गलियां पार करके वह एक पुराने से मकान के सामने रुक गए। दहलीज में अंधेरा था। वह सीढि़यां चढ़ने लगे। बोले-‘‘बेखटके चले आओ, मैंने मजबूती से थाम रखा है। गिरने नहीं दूंगा।’’ मैं उनके पीछे-पीछे सीढि़यां चढ़ गया।
राघव मुझे एक कमरे में ले गए। यहां खुली खिड़कियों से दिन का उजाला अंदर आ रहा था। उन्होंने मुझे पलंग पर बैठा दिया और फिर जोर से बोले-‘‘जल्दी से पानी गरम करो। थोड़ी-सी रूई ले आओ। फिर दूध गरम करके थोड़ी-सी हल्दी मिलाकर ले आना।’’
उन्होंने दूसरे कमरे की तरफ देखकर यह बात कही थी, पर कोई जवाब नहीं मिला। आखिर उन्होंने किससे बात की थी? दूसरे कमरे में सन्नाटा था। मैंने देखा एक तरफ खूंटी पर एक साड़ी झूल रही थी। कुछ पल हम खामोश बैठे रहे। फिर राघव ने कहा-‘‘लगता है, किसी काम से कहीं चली गई है। कोई बात नहीं, मैं खुद पानी गरम करके लाता हूं।’’
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वह जैसा कहें वैसा करने के अलावा और चारा भी नहीं था। कुछ देर बाद एक कटोरी में गरम पानी और रूई लेकर आए। पहले मुंह और हाथ पर लगी धूल-मिट्टी को साफ किया, फिर खरोंचों पर दवा लगा दी। अब पहले से कुछ आराम महसूस हो रहा था। इसके बाद मेरे बार-बार मना करने पर भी राशव ने मुझे हल्दी मिला दूध पिला ही दिया। एक बार को तो ऐसा लगा जैसे वह नहीं, नानी मेरी देखभाल कर रही हैं।
मरहम-पट्टी करने के बाद वह कुछ देर चुप बैठे रहे। मैं सोच रहा था-आखिर इनके साथ और कौन रहता है ? क्या कोई मेरे जैसा भी है। फिर एकाएक मुझे घर की याद आई और मैं हड़बड़ा कर उठ खड़ा हुआ।
‘‘हां, अब तुम्हें चलना चाहिए। अब पहले से ठीक लग रहे हो। अगर पहले वाले हुलिए में तुम्हारी नानी तुम्हें देख लेतीं तो शायद बेहोश हो जातीं। अब सीधे घर जाओ, और आज खेलने मत जाना।’’ फिर मेरा हाथ थामकर धीरे-धीरे नीचे ले आए। वह शायद सोच रहे थे कि मुझे ज्यादा चोट लगी है। पर ऐसा कुछ नहीं था। मैं खुद को एकदम ठीक महसूस कर रहा था।
नीचे आकर बिना कुछ कहे मैं अपनी गली की तरफ चल दिया। थोड़ा आगे आकर मैंने घूमकर देखा, राघव अपनी जगह खड़े थे और मेरी तरफ ही ताक रहे थे।
जैसा राघव ने कहा था, वैसा ही हुआ। मुझे देखकर नानी ने माथे पर हाथ मारा और एक साथ न जाने कितनी बातें पूछ गईं। मैं ठीक-ठीक समझ न पाया कि मेरी नानी को राघव इतनी अच्छी तरह कैसे जानते थे, जबकि मैंने उन्हें अपने घर के आसपास भी नहीं देखा था।
नानी गालियां बक रही थीं-‘‘अरे नासपीटे, यह कहां से चोट खाकर आ रहा है। मुंह तो खोल किससे मार खाकर आ रहा है। मैं खून पी जाऊंगी उसका। तू नाम तो बता। और यह मरहम-पट्टी किससे करवाई।’’
मैं जानता था नानी को मैं जैसे चाहूं बहका सकता था। मैंने ठोकर खाकर गिरने की झूठी कहानी बनाकर सुना दी, पर राघव के बारे में तो सच बोलना ही पड़ा।
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मैंने देखा राघव का नाम सुनते ही नानी के माथे पर बल पड़ गए। ‘‘वह कौन होता है तुझे अपने घर ले जाने वाला। अरे किसी दिन यूंही उड़ाकर ले जाएगा और मैं देखती रह जाऊंगी। उसके मन में जहर है। सांप है वह।’’
नानी न जाने कितनी देर तक राघव को बुरा-भला कहती रहीं। मैं नानी की यह आदत कभी न समझ पाया। जिसे चाहतीं बुरा कह देतीं। पहले हरना बाबा की पत्नी को डायन कहा था और आज राघव की बारी थी। लेकिन राघव ने तो मेरी मदद ही की थी। मैं उन्हें बुरा हरगिज नहीं कह सकता था। पर नानी पता नहीं राघव से क्यों नाराज थीं। राघव के बारे में मेरे मन की बात अगर नानी को पता चल जाती तो समझो मेरी आफत थी। मैं चुप खड़ा रहा।
अपने मन की भड़ास निकालकर नानी मुझे गोद में लेकर बैठ गईं। बोली-‘‘आज के बाद राघव जब भी मिले उससे बात न करना-उसकी तरफ देखना भी मत। वह तो मुझे बर्बाद करना चाहता था।’’ कहते-कहते वह रोने लगीं। यह एक नई मुश्किल थी। उनकी कोई बात मेरी समझ में नहीं आ रही थी। उस रात सोने के समय तक उन्होंने कम से कम चार बार मुझे समझाया था कि राघव से कभी बात न करूं।
रात को सपने में मैंने राघव को देखा। वह धीरे-धीरे मेरे बदन पर दवा लग रहे हैं और फिर किसी की नरम उंगलियां मेरा सिर थपकने लगीं। वह तो नानी ही हो सकती थीं।
नानी ने दो-तीन दिन मुझे घर से नहीं निकलने दिया। उनके हिसाब से मुझे बहुत चोट आई थी। उनकी घबराहट देखकर मुझे हंसी आ रही थी।
पंद्रह दिन बीत गए थे। एकाएक नानी के मुंह से राघव का नाम सुनकर मैं  चौंक गया। वह पड़नानी से बात कर रही थीं। मैंने उनके शब्द सुने-‘‘उसने देवन को बुलाया है।’’ फिर नानी और पड़नानी फुसफुस करके बातें करने लगीं। आज पहली बार राघव के बारे में सुन रहा था। आखिर बात क्या थी?
मैं समझ गया कि मेरे पास में खड़े रहने के कारण ही नानी और पड़नानी इतनी गुपचुप बातें कर रही थीं। मैं सोच रहा था आखिर ऐसी कौन-सी गुप्त बात थी जिसे ये दोनों मुझसे छिपाना चाहती थीं। मैं जितना सोचता उतना ही दोनों की बातें सुनने की उत्कंठा बढ़ती जाती।
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नानी पड़नानी आंगन में वहां बैठी थी जिसके पीछे कोठे का बंद दरवाजा था। मैं धीरे-धीरे नजर बचाकर कोठे के अंदर चला गया। अब मैं बंद दरवाजे से एकदम चिपककर खड़ा था और मुझे नानी और पड़नानी की गुपचुप बातें एकदम साफ सुनाई दे रही थीं।
मैंने ध्यान लगाया। वे दोनों राघव के बारे में बातें कर रही थीं। मैंने नानी को कहते सुना-‘‘राघव छत से फिसलकर गिर गया है। उसकी कमर में काफी चोट आई है। उसने अपने छोटे भाई को भेजा था। कहलवाया था कि वह देवन से मिलना चाहता है। मेरा मन डर रहा है। भला वह क्यों बुला रहा है देवन को। पता नहीं बच्चे के मन में क्या जहर भरना चाहता है। मैं तो कभी नहीं जाने दूंगी देवन को उसके पास।’’
मुझे नानी के ऊपर जोर का गुस्सा आया। मैं तो कभी सोच भी नहीं सकता था कि नानी ऐसी बातें भी कर सकती हैं। आखिर राघव ने क्या बिगाड़ा है नानी का! राघव छत से गिर गए हैं यह सुनते ही मन बेचैन हो उठा। मैंने तय कर लिया कि मैं राघव से मिलने जरूर जाऊंगा। आखिर वह क्या कहना चाहते थे मुझसे। और उन्होंने नानी का क्या बिगाड़ा था जो वह उनसे इतना नाराज थीं। राघव छत से गिरकर घायल हो गए थे, पर नानी उनसे अब भी इतनी नाराज थीं। आखिर ऐसी क्या बात थी? नानी चाहे जो कहें , कितना भी क्यों न मना करें, मैं राघव से मिलने जरूर जाऊंगा।
मैं कोठे में तब तक छिपा रहा था जब तक नानी किसी काम से ऊपर छत पर नहीं चली गईं। पड़नानी रसोई में काम कर रही थीं और मैं चुपचाप बाहर चला गया।
मैं कुछ देर हरना बाबा की लाइब्रेरी में समय बिताकर लौटा तो नानी जैसे मेरी ही प्रतीक्षा कर रही थीं। झट बोलीं-‘‘क्या तू राघव के पास गया था?’’
‘‘नहीं, मैं तो बाहर हरना बाबा की लायब्रेरी में अखबार पढ़ने गया था।’’ मैंने कह दिया, पर नानी को जैसे फिर भी तसल्ली नहीं हुई। हाथ थामकर पास बैठाते हुए बोलीं-
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‘‘हां, देख अब राघव से कभी मत मिलना। वह अच्छा आदमी नहीं है।’’
मन हुआ, कह दूं कि जरूर जाऊंगा। वह बीमार हैं, बुरी तरह घायल हैं, यह बात तुम मुझसे क्यों छिपा रही हो। पर मैंने कुछ न कहा। और छत पर जाकर आकाश में उड़ती पतंगों के पेच देखने लगा।
रात में कई बार सपने में मैंने राघव को देखा। वह मेरी ओर हाथ बढ़ाकर मुझे बुला रहे हैं और मैं तेजी से उनकी तरफ दौड़ रहा हूं-पर देर तक दौड़ते रहने के बाद भी मैं उनके पास तक नहीं पहुंच पा रहा हूं। सुबह नींद खुली तो अभी अंधेरा था। नानी गहरी नींद में सो रही थीं। उनके पास ही पड़नानी की चारपाई बिछी थी। बार-बार एक ही बात मन में आ रही थी-क्या मैं राघव से मिल सकूंगा। कहीं नानी मुझे पकड़कर रोक तो न लेंगी?
सुबह मैं स्कूल के समय से काफी पहले तैयार हो गया। नानी ने देखा तो बोल उठीं, ‘‘आज कहां जा रहा है जो इतनी जल्दी तैयार हो गया।’’ मैं चुप रहा कि कहीं मेरे मुंह से राघव का नाम न निकल जाए। तब तो सारा ही गुड़ गोबर हो जाएगा।
मैं घर से निकला तो दिल तेज-तेज धड़क रहा था। कन्धे पर लटकता बस्ता ऐसा बोझिल हो गया था जैसे उसमें किताब-कापियों की जगह पत्थर भरे हों। मैं धीरे-धीरे राघव वाली गली में जा पहुंचा। अब तक ऐसा कोई नहीं दिखाई दिया था जो जाकर नानी से मेरे इधर-उधर भटकने की बात बता सकता।
कुछ देर तक मैं राघव के मकान के बाहर खड़ा रहा। उस दिन की तरह आज भी दहलीज में  अंधेरा था। मैं सीढि़यां चढ़ता गया। सामने ही राघव का कमरा था। वहां कई लोग दिखाई दिए, उनमें राघव नहीं थे। वह हो भी कैसे सकते थे। वह बुरी तरह घायल जो हो गए थे।
पहली बार जब मैं आया था तो राघव के घर में दूसरा कोई नहीं था, पर आज तो वहां भीड़-सी थी। मतलब कोई खास बात जरूर थी, पर किससे पता करूं। राघव तो मुझसे बहुत बड़े थे। क्या मैं उनका नाम पुकार सकता था? मुझे दरवाजे के पास खड़े-खड़े काफी समय हो गया, पर किसी ने मेरी तरफ  ध्यान नहीं दिया। सब आपस में बातें कर रहे थे। लेकिन समझ में कुछ नहीं आ रहा था। मैं सोच रहा था, मुझे लौट जाना चाहिए। तभी शायद किसी ने मुझे देख लिया। आवाज आई, ‘‘कौन है?’’
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‘‘कौन है?’’ यह दूसरी आवाज थी-लेकिन राघव अब तक दिखाई नहीं दिए थे।
‘‘मैं देवन।’’
‘‘देवन...कौन देवन?’’
इस बात का भला मैं क्या जवाब दे सकता था। क्या इतना काफी नहीं था कि मैं देवन था और बीमार राघव मुझसे मिलना चाहते थे। उन्होंने मुझे बुलवाया था। नानी को तो यही कहते सुना था मैंने।
कमरे में मेरा नाम कई बार दोहराया गया। फिर आवाज उभरी, ‘‘अरे दीबू, अंदर आ जा। बाहर क्यों खड़ा है?’’ यह राघव का स्वर था। मैं झट से अंदर घुस गया। देखा पलंग पर राघव लेटे हैं। उनके बदन पर पट्टियां बंधी थीं। मुझे देखते ही उन्होंने उठना चाहा, पर उठ न सके। उनके मुंह से दर्द की एक चीख निकल पड़ी। वह सचमुच बहुत बीमार लग रहे हैं। मैं पलंग के एकदम पास जा खड़ा हुआ। राघव ने दोनों हाथों में मुझे बांध लिया और रो पड़े। बिल्कुल वैसे ही जैसे अखबारों की कोठरी में हरना बाबा की पत्नी ने मुझे बांहों में भर लिया था।
मैंने खुद को उनसे अलग किया और थोड़ा पीछे हट गया। वह बोल उठे-‘‘अरे, कहां जा रहा है। क्या इसीलिए आया था।’’
मैंने पूछा-‘‘आप कैसे हैं?’’
‘‘तू आया तो मैं अच्छा हो गया।’’ कहकर वह मुस्करा दिए। मैंने देखा कमरे में तीन जने थे। मैं उनसे से किसी को भी नहीं पहचानता था। मैंने महसूस किया मेरे कमरे में जाते ही सब चुप हो गए। राघव ने भी आंखें मूंद लीं जैसे बहुत थक गए हों। मेरी समझ में नहीं आ रहा था कि मैं वहां रुकूं या चला जाऊं। तभी मैंने देखा, राघव की हथेली मेरी कलाई पर थी। उनकी बंद पलकें गीली-गीली लग रही थीं। जैसे मेरे बिना कहे ही उन्होंने मेरी बात जान ली थी। तो वह नहीं चाहते थे कि मैं चला जाऊं।
कमरे में मौजूद तीनों लोग बारी-बारी से बाहर चले गए। मैंने सुना, वे कह रहे थे-‘‘हम अभी आते हैं।’’ क्या उन लोगों ने भी राघव की बात समझ ली थी। आखिर वे थे कौन? मैंने देखा खूंटी पर एक रंगीन साड़ी उस दिन की तरह लटकी हुई थी, पर कोई औरत या बच्चा तो घर में नजर नहीं आया था। साड़ी किसकी थी? क्या राघव घर में अकेले रहते थे? तब इस बीमारी में उनकी देखभाल कौन करेगा?
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राघव ने खींचकर मुझे पलंग पर अपने पास बैठा लिया। वह धीरे-धीरे मेरा कंधा थपक रहे थे। मैंने पूछा-‘‘क्या हुआ,  आप कैसे गिर गए?
‘‘एक रात मैं छत पर था, तभी तेज बारिश आ गई। मैं तेजी से उतरने लगा तो पैर फिसल गया। सीढि़यां गीली थीं। बस फिसलता चला गया। उठना चाहा तो उठ न सका। कमर में ज्यादा चोट है। उठ-बैठ नहीं पाता हूं। दवा से कोई आराम नहीं है।’’
‘‘आप अच्छे हो जाएंगे।’’ मैंने कहा दिया। सचमुच ही मैं चाहता था कि वह ठीक हो जाएं। वह मुझसे बहुत प्यार करते थे, पर...
राघव ने कहा-‘‘कमरे का दरवाजा बंद कर दे। मुझे तुझसे कुछ कहना है। कोई बीच में न आ जाए। घबरा मत, कोई ऐसी-वैसी बात नहीं है।’’ वह कैसे मेरे मन की बात जान गए थे। दरवाजा बंद करने की बात सुनकर मैं सचमुच डर गया था।
मैंने उठकर धीरे से दरवाजा उढ़का दिया पर कुंडी नहीं लगाई। आखिर बात क्या थी? क्यों बुलाया था उन्होंने मुझे? मैं दरवाजा उढ़का कर लौटा तो उन्होंने फिर मेरी कलाई थाम ली। पूछने लगे-‘‘जानता है, मैंने तुझे क्यों बुलाया है? और यह तो बता तेरी नानी ने तुझे कैसे आने दिया मेरे पास।’’ कहकर वह धीरे से मुस्करा दिए।
मैंने सब बता दिया जो पिछली शाम हुआ था।
सुनकर वह हंस पड़े फिर उन्होंने एक गुलाबी लिफाफा तकिए के नीचे से निकाला और मेरे हाथ में थमा दिया। बोले-‘‘खोलकर देख ले।’’
मैंने पाया उसमें मेरी मां का फोटो था। मैं फोटो हाथ में लिए खड़ा हो गया। दिमाग में सन-सन हो रही थी। मां का फोटो राघव के पास कैसे आया? क्या मां ने इन्हें दिया होगा? क्या मां जानती थी राघव को? सिर चकराने लगा। बात समझ में नहीं आ रही थी।
‘‘बैठ, बैठ सब बताता हूं। इसीलिए तो बुलाया है तुझे। बहुत दिनों से कहने की सोच रहा था, पर टाल जाता था। जब भी तुझे देखता था तो मन में आता था सब बता दूं।’’
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मैं चुप सुन रहा था। वह बोलते जा रहे थे। ‘‘जानता है मैं बहुत वर्षों से तुम्हारी नानी के घर में आता था। तब तेरी मां की शादी नहीं हुई थी। सच कहूं मैं चाहता था...मैं चाहता था... लेकिन तेरी मां की शादी रामपुर में हो गई और मैं...’’ राघव कुछ देर खामोश रहे। और मैं सोच रहा था आखिर नानी ने ये सब बातें क्यों मुझसे छिपाकर रखी थीं। वे राघव के बारे में और क्या जानती थीं।
‘‘तेरी मां की शादी रामपुर में एक डाक्टर से हो गई और मैं कुछ न कर सका। लेकिन उसके बाद मैंने शादी नहीं की। पर एक साल बीतते न बीतते तेरी मां रामपुर से दिल्ली आ गई। तब तू बहुत छोटा था। कहते हैं तेरे डाक्टर पिता को किसी ने जहर खिला दिया था।’’
यह बात तो एक बार नानी ने भी मुझे बताई थी। यह भी बताया था कि मेरे नाना की मौत भी जहर दिए जाने से देहरादून में हुई थी। उस समय मेरी मां भी मेरी तरह एक बरस की भी नहीं थीं। और नानी उसी तरह मां को दिल्ली ले आई थीं जैसे मां रामपुर से मुझे लाई थी।
‘‘रामपुर से आने के बाद तेरी मां बहुत उदास रहती थी। तब एक दिन मैंने तेरी नानी से कहा था-‘‘विद्या को आगे पढ़ने दो, इससे मन लगा रहेगा, वरना वह कुछ कर लेगी।’’
मैं हैरान था। राघव मेरी मां के कितना निकट थे. मैं इस बारे में कुछ भी नहीं जानता था।
‘‘अब रहने दीजिए, आप थक जाएंगे।’’ मैं मां का फोटो हाथ में लिए उठ खड़ा हुआ। राघव ने कहा था-‘‘यह फोटो मैं तुझे नहीं दे सकता। तेरे पास तो मां है।’’
मैं चुप उनकी ओर देख रहा था। क्या उन्हें यह सच पता नहीं था कि मां तो मुझे छोड़कर कब की चली गई थीं। लेकिन कुछ ही देर में मैं जान गया कि उन्हें मां के बारे में सब कुछ पता था। क्या वह सच कह रहे थे कि वह मां से शादी करना चाहते थे। उन्होंने मां के साथ मुझे भी अपनाने की बात नानी से कही थी। लेकिन उनकी बात नहीं मानी गई। राघव के हमारे घर में घुसने पर रोक लगा दी गई। और फिर गुपचुप मां को अंधेरे में रखकर उनकी शादी ऐसे आदमी से कर दी गई जो पांच बच्चों का पिता था।
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यह सच था कि मां शादी के बाद मुझे अपने साथ नए घर में नहीं ले जा सकी थीं। वहां उन्हें पांच बच्चों की सौतेली मां बनना पड़ा था। पर राघव की बात क्यों नहीं मानी गई? अगर मां के साथ मैं भी राघव के पास रह सकता तो...फिर मैं मां से दूर क्यों रहता? पर नानी ने क्यों नहीं मानी राघव की बात। जो राघव कह रहे थे क्या वही सच था या वह झूठ बोल रहे थे। पर मां का फोटो मैंने सिर्फ उन्हीं के पास देखा था। मैं जान गया था कि वह मुझे सचमुच बहुत प्यार करते थे।
फिर राघव ने आंखें बंद कर ली थीं। लगता था जैसे वह बहुत थक गए हों। पर अभी बात पूरी कहां हुई थी। मैं उनसे और सुनना चाहता था, पूरी बात जानना चाहता था। तभी दरवाजे पर आहट हुई और तीनों लोग अंदर आ गए। अब मुझे चलना चाहिए था। लगता था जैसे राघव एकाएक गहरी नींद में सो गए हों। मैं चाहता था कि उनसे मां का फोटो ले लूं। पर न जाने उन्होंने कहां रख दिया था। मैं कुछ देर चुपचाप खड़ा रहा फिर धीरे-धीरे नीचे चला आया। मुझे मां की याद आ रही थी। मुझे कौन बताएगा कि राघव ने जो कहा  था उसका सच क्या था?                     ( आगे और है )
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2 टिप्‍पणियां:

  1. आगे की कहानी का इंतज़ार है...सचमुच आपकी आत्मकथा बहुत रोचक है रह रह कर मोड़ लेती रहती है और जानने की जिज्ञासा बढ़ती जाती है कि इसके बाद क्या हुआ होगा!

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    1. धन्यवाद. आपकी टिप्पणी उत्साहवर्धक है. अगली क़िस्त जल्दी ही पोस्ट करूंगा.

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