शनिवार, 20 फ़रवरी 2016

आत्मकथा - एक


अपने साथ
                                                                                                               देवेन्द्र कुमार
…… मैं माँ को अपना अपराधी मानता था. और इसीलिए जब वह कुछ समय के लिए वर्ष
में एक बार नानी के पास आया करती थीं तो मैं उनसे दूर भागता रहता था.उनकी आँखों
में आंसू मुझे आनंद देते थे.लेकिन मैं गलत था ,कुछ बड़े होने पर समझ आया कि मुझे छोड़
कर चले जाने के लिए उन्हें विवश कर दिया गया था.इसका सम्बन्ध उनके औरत होने से था,
हमारे  समाज में औरत होने के कितने और क्या-क्या अनर्थ होते हैं इसका अनुभव मुझे छुटपन
में ही करा दिया गया था.   

    पहली बात समझ में आई थी वह यह कि मैं अकेला हूं। यों घर में मेरी नानी, उनकी मां यानी मेरी पड़नानी तथा कुछ लड़कियां थीं। उनके रिश्ते आपस में क्या थे , यह बात कभी समझ में नहीं आई.  मैंने अपने पिता को नहीं देखा। मां की दूसरी शादी कर दी गई थी गुपचुप तरीके से। कहते हैं तब मैं बहुत छोटा था, वरना मां की दूसरी शादी तथा पिता के न होने के बारे में शायद कुछ सोचता, कहता। मां को आखिरी क्षणों तक नहीं बताया गया था कि उनकी दूसरी शादी पांच बच्चों के एक  विधुर पिता के साथ   होने जा रही है।इसके लिए मां ने नानी के कभी क्षमा नहीं किया। बचपन में अपने को यों अकेला छोड़ दिए जाने के लिए मैं मां को दोषी मानता था। जब वह न रहतीं, ऐसा अक्सर ही होता था, तो मुझे उनकी याद आती। साल में एक-दो बार कुछ दिनों के लिए वह मेरे पास आतीं तो मैं उनसे ठीक से बात न कर पाता। जैसे किसी की छाया हमारे बीच आ खड़ी होती। मुझे याद आता है, रात के समय वह मुझे लिपटा लेतीं और मैं छिटक कर परे हो जाता, कोई मुझे उनके एकदम निकट जाने से रोकता। तब वह
रोने लगतीं. कुछ दिनों तक यह बात मां की समझ में नहीं आई थी कि मैं ऐसा क्यों करता हूं। उन्होंने जानना चाहा,  और मुझे गुस्सा आ गया था। क्या वह इतनी सी बात भी नहीं समझ पाती थीं। और फिर शायद जैसे मुझे सूंघकर उन्होंने कुछ समझा था और मुझे समझाने की कोशिश की थी। रोते-रोते अधूरे शब्दों में ऐसी कोई बात कही थी कि उन्हें कुछ पता नहीं था। उन्हें विवश कर दिया गया था और अब पीछे, यानी मेरे पास पूरी तरह लौटना और फिर कहीं न जाना उनके लिए मुश्किल था। शायद उन्होंने सच कहा था, पर मेरा मन उन्हें पूरी तरह दोषमुक्त नहीं कर पाया था। वह कुछ दिन रहकर चली जातीं तो मैं सोचा करता था-आखिर जिस पांच बच्चों के पिता के साथ रहती थीं, वह उनके हाथ-पैर बांधकर तो नहीं रखता होगा। तब वह भागकर मेरे पास क्यों न चली आई। यह समझने में बहुत दिन लगे कि औरत होने का मतलब हमारे समाज में क्या होता है। सच कहूं तो वह समझ आज तक भी पूरी तरह बनी नहीं है।
                                1

हमारा घर बड़े दर-दालान और अंधेरे कोठों वाला था। बिजली नहीं थी और दिन में भी छत के नीचे अंधेरा जैसे लटकता रहता था। छत के नीचे काले रंग की मोटी-मोटी लकडि़यां लगी हुई थीं। अंदर के कोठों में हम बच्चे नहीं जाते थे। हां, उनके निकट जाने पर अंदर से अजीब सी गंध आया करती थी। घर में औरतें दिन में ढिबरी या लालटेन लेकर अंदर जाती थीं। न जाने वहां घर का क्या-क्या सामान रखा रहता था। कभी-कभी मन होता था, भाग कर उन अंधेरे कोठों में चला जाऊं। उन्हीं के अंदर से ही कोई न कोई रास्ता तो कहीं न कहीं निकलता ही होगा। फिर नानी और पड़नानी हाथ में लालटेन लेकर घबराई सी मुझे ढूंढ़ती रहें और मैं उन्हें न मिलूं। मैं सोचता जरूर था लेकिन उन कोठों के अंधेरे रहस्यलोक में गुपचुप जाकर गुम हो जाने की हिम्मत कभी न जुटा सका।
घर चलता था मेरी नानी के भाई के सहारे से जो आगरा में किसी कागज की फर्म में मैनेजर थे। उनकी पत्नी सुजानी घर में हमारे बीच रहा करती थीं। मैं उन्हें कहीं आते- जाते न देखता था । जब आगरे वाले आते तब भी मैं उन्हें दरवाजे की ओट से झांकते हुए देखा करता था। वह आगरे नहीं जाती थीं। आगरे वाले आकर मेहमान की तरह थोड़ी देर के लिए ठहरते थे। वह आंगन में बिछी चारपाई पर अपनी छड़ी टिकाकर बैठ जाते और सारा घर उनके इर्दगिर्द खड़ा रहता। कोई कुछ न कहता। वह बस जरा सी देर रुकते। मेरी नानी और पड़नानी उनके सामने खाने को अच्छी-अच्छी चीजें रखतीं पर वह कुछ न खाते। मुझे पास बुलाकर मेरे कंधों पर हाथ रखकर दबाते, मुस्कराते और चले जाते।
वह घर में सबसे इतना दूर-दूर क्यों रहते थे यह बात मैं कभी नहीं समझ पाया। वह पड़नानी के बेटे होकर भी घर के क्यों नहीं थे। हमेशा ही बाहर-बाहर से लौटकर क्यों चले जाते थे। क्या वह नहीं जानते थे कि उनकी पत्नी सदा ही दरवाजे की ओट से छिपकर उन्हें देखा करती थीं। मेरी समझ में नहीं आता था कि दोनों आपस में बात क्यों नहीं करते थे? यह बात बहुत बाद में पता चली थी कि इस सब का मतलब भी उनके औरत होने से था। एक औरत मेरी मां, दूसरी आगरे वालों की पत्नी सुजानी और तीसरी...।
                             2

वह जो तीसरी थीं उनके पास पड़नानी मुझे कई बार एकदम सुबह-सुबह भेजा करती थीं। ऐसा तभी होता था जब आगरे वाले दिल्ली आते थे। वह उन्हीं के घर में ठहरते थे ,जो हमारे घर से कुछ दूर दूसरी गली में था। वह आगरे वालों की क्या थीं, इस सवाल का जवाब कभी न मिला। बस, पड़नानी मुझे समझाकर भेजतीं और मुझे न चाहते हुए भी जाना पड़ता था।
मैं दरवाजे का कुंडा खटखटाता तो एक सुंदर औरत दरवाजा खोलती। वह बहुत तमक कर बोलती और झिड़क कर भगा देती। कहती-अभी सो रहे हैं। इतनी सुबह क्यों आता है।मैं नाराज होकर वापस लौटता तो पड़नानी मुझे फिर से भेज देतीं और तब वह औरत अंदर से लाकर कुछ रुपए मेरी हथेली पर रख देती। वह मुझसे अंदर आने को कभी न कहती। हालांकि मैं अंदर जाकर देखना चाहता था कि आगरे वाले कहां हैं? क्या उस मकान में भी हमारे घर की तरह सील भरे अंधेरे कोठे थे, जिनमें जाकर गुम हुआ जा सकता था।
मैं देखता था हर बच्चे के अपने मां-बाप थे और तब मुझे नानी और मां पर गुस्सा आता जो घूम-फिर कर उदासी और रोने में बदल जाता। मैं महसूस करता था, बाकी लोग मुझसे अलग हैं। मां का मेरे पास न होना मेरी सबसे बड़ी मुश्किल थी, जो कभी हल न हुई। यों घर में सब मुझे प्यार करते थे। घर में थीं कई लड़कियां, वे करीब-करीब बराबर की उम्र की थीं। वे अक्सर हंसती रहती थीं। जब वे हंसतीं तो मैं हैरानी से उनका मुंह देखता, क्योंकि तब हंसी की कोई बात न होती और घर में दूसरा भी कोई हंसता हुआ नजर न आता। उनकी हंसी रात के अंधेरे में ज्यादा सुनाई देती थी। पड़नानी ज्यादा देर लालटेन नहीं जलाने देती थीं। वह कहती थीं-जब लेटना है तो लालटेन क्यों?’
मैं अंधेरे में लेटकर सुनता, सोचता। तब धीरे-धीरे बढ़ते अंधेरे और सन्नाटे में एक के बाद दूसरी मीठी खिलखिल उभरने लगती। सब लड़कियां पास-पास लेटतीं। पता नहीं धीरे-धीरे क्या बातें करती हुई हंसतीं। हंसी तेज होती तो नानी और पड़नानी बारी-बारी से उन्हें टोकतीं। तब कुछ देर के लिए चुप्पी छा जाती और अंदर वाले कोठों से अजीब-अजीब सी आवाजें उभरने लगतीं। मैं डर जाता। मां की याद आने लगती, और तब एकाएक लड़कियों की हंसी फिर से उभरकर मुझे जैसे उबार लेती। मैं उनकी हंसी और जबरन चुप्पी के बीच जैसे झूले में झूलता हुआ कब नींद में चला जाता, पता ही न चलता।
                                3

अब याद नहीं रह गया कि किताबों से पहले-पहल दोस्ती कैसे हुई। घर में किताबें थी नहीं। बिना बिजली के रेडियो की कल्पना असंभव थी। कोई पढ़ता हुआ दिखाई नहीं देता था। तभी एक दिन नानी ने पूछा-‘‘मां के पास जाएगा?’’
‘‘क्या?’’-मेरे मुंह से निकला। मुझे अपने अंदर कुछ जलता, उबलता हुआ लगा। आंखों में उमड़ते आंसुओं को पीकर मैं जैसे फट पड़ा था-‘‘नहीं जाऊंगा,कभी नहीं जाऊंगा। मां को आना है तो आ जाए।’’ पराए पुरुष के घर में उसके बच्चों की देखरेख करने वाली मां भला मेरी कितनी रह गई होगी।
फिर भी जैसे मैंने नानी को टटोलने के लिए पूछा था-‘‘वहां कैसे जा सकता हूं?’’
‘‘कुछ पढ़ लिख। कुछ बनकर दिखा, नहीं तो कौन सा मुंह लेकर जाएगा उसके पास।’’
मैं भागकर गली में निकल आया था। वहां एक लंबे चबूतरे पर कुछ अखबार फैले हुए थे। कई लोग अखबार पढ़ रहे थे। पता नहीं किसने एक अखबार नाली में गिरा दिया था। मैंने अखबार उठाया और चबूतरे पर रख दिया। रखने से पहले मेरी आंखें अखबार पर टिक गई थीं।
मेरी पढ़ाई अखबार से ही शुरू हुई थी। शुरू-शुरू में मैं पढ़ता नहीं था, बस जाकर वहां खड़ा हो जाता था। देखता था लोग कैसे अखबार पढ़ते हैं, कैसे बातें करते हैं। उनमें अक्सर ही लड़ाई-झगड़े और बम की बातें होती थीं। जब पहले दिन अखबारों के पास से अंदर लौटा तो मैंने गर्व से नानी को बताया था कि मैं अखबार पढ़कर आया था। उन्होंने मुझे हाथों में भर लिया था और आंसू बहाने लगी थीं। मैं समझ न सका था कि इसमें भला रोने की क्या बात थी।
                             
                                4

गली की लाइब्रेरी हरनारायण नामक बूढ़े व्यक्ति चलाते थे। लोग उन्हें हरना बाबा कहते थे। एक दिन उन्होंने मुझे खड़े देखकर पूछा था-‘‘ऐ, तुम क्या करते हो!’’
‘‘मैं अखबार पढ़ता हूं।’’
सुनकर वह हंसे थे। उन्होंने कहा था-‘‘इधर-उधर बिखरे अखबारों को ठीक से लगाया करो।’’ बस इसके बाद मुझे किसी से कुछ पूछने की जरूरत नहीं रह गई थी। मैं सुबह से ही अखबारों के बीच बना रहता था। लोग पढ़कर उठते और अखबारों को यूं ही फैले हुए छोड़कर चले जाते। मैं बार-बार अखबारों को करीने से लगाता। धीरे-धीरे वह काम मेरा हो गया। दोपहर को जब गली में सन्नाटा होने लगता तो मैं अखबारों को एक के ऊपर एक रखकर एक कोठरी में, जो शायद अखबारों के लिए ही थी, कोने में रख देता।
हरना बाबा ने मुझे छूट दे दी थी कि शाम को अकेला ही अखबारों को देख-छू सकता था।
उस कोठरी में अखबारों के अलावा और पुराना सामान भी पड़ा रहता था। और उनमें से वैसी ही गंध आया करती थी जैसे हमारे घर के सील भरे कोठों से आती थी, जिनके अंदर मैं कभी नहीं गया था।
एक दिन की बात है, दोपहर हो गई थी और मैं अखबारों वाली कोठरी में बैठा था। अखबारों को करीने से एक के ऊपर एक रखने का काम मैं कर चुका था और अब घर जाना चाहिए था, लेकिन मेरा मन वहां से जाने का नहीं हो रहा था। मुझे लगा अगर नानी से छिपकर बैठना हो तो मैं उस कोठरी में बैठा रह सकता था। वहां कोई मुझे ढूंढ़ने वाला नहीं था। क्या वहां से भी कोई रास्ता ऐसा था जो दूर शहर में मां के पास तक जाता हो। यह मां भी अजीब थी। मुझसे कितनी दूर थी, लेकिन जब देखो तो मेरे आस-पास मौजूद रहती थी। मैं कुछ भी करता, कुछ भी सोचता सबसे पहले मां दिखती थी आस-पास मंडराती हुई।

                               5

मैं अखबारों के बीच में बैठा था। हरना बाबा घर में नहीं थे और उनकी पत्नी चारपाई पर लेटी हुई थीं। मैं उन्हें हमेशा चारपाई पर लेटे हुए ही देखता था। जब वह चलतीं तो दीवार पकड़ कर। उनके पैरों पर पट्टियां बंधी  रहती थीं। न जाने उन्हें क्या बीमारी थी।
जहां अखबार रखे जाते थे उस कोठरी के दूसरे कोने में फटी-पुरानी किताबों का ढेर था। मैंने उसे कभी नहीं छुआ था-लेकिन अब अखबारों के लिए जगह कम पड़ने लगी थीं। मैंने किताबों को परे सरकाया तो वही अपने घर के अंधेरे कोठों वाली गंध आने लगी। एक बार कुछ डर सा लगा, कहीं कोई कुछ कह न दे, पर फिर मैं किताबों वाले कोने की सफाई करने में जुट गया। किताबों के पन्ने पीले और फटे हुए थे। झरोखे की मद्धिम रोशनी में कुछ साफ-साफ नहीं दिखाई दे रहा था। मैं किताबों की धूल झाड़ता और उन्हें एक के ऊपर एक रखता जाता। मैंने देखा अब अखबारों के लिए काफी जगह निकल आई थी।
सारी किताबें हट गईं तो उनके नीचे एक बटुआ नजर आया। मैंने हाथ बढ़ाया फिर पीछे हटा लिया। मुड़कर देखा तो हरना बाबा की पत्नी चारपाई पर सो रही थीं। मैं खुद को ज्यादा देर नहीं रोक सका। मैंने बटुआ उठा लिया। यह वैसा ही था जैसा आगरे वाले अपनी जेब में रखा करते थे। लेकिन उनका बटुआ तो एकदम चमकता रहता था, जबकि कोठरी की जमीन पर पड़ा यह बटुआ एकदम घिस चुका था। मैं अपने को रोकता रहा लेकिन बेकार। मैंने एक बार फिर पीछे देखा। हरना बाबा कहीं नहीं थे, उनकी पत्नी चारपाई पर लेटी थीं। मैंने कांपते हाथों से बटुआ उठाया और खोल दिया। बटुए के अंदर पुराने कागज भरे हुए थे-मैं कागज निकालता गया, पर रुपए जैसी कोई चीज बटुए में नहीं थी। बटुए की एक जेब में एक फोटो रखा था-बहुत पुराना। फोटो में एक बच्चा पेड़ के नीचे खड़ा था। उसका चेहरा धुंधला-धुंधला सा था। ऐसा कोठरी में छाए धुंधलके की वजह से था या सचमुच ही वैसा था, पता नहीं चला। मैं फोटो हाथ में लिए बैठा था। अब घबराहट की जगह गुस्से ने ले ली थी जो अपने ऊपर आ रहा था। तभी एक छाया सी पड़ी। मैंने देखा कोठरी की चौखट पर दोनों हाथ टिकाए हरना बाबा की बीमार पत्नी खड़ी थीं। उनकी आंखें मुझे घूर रही थीं। मैं हड़बड़ाकर उठ खड़ा हुआ। फोटो मेरे हाथों से छूटकर गिर पड़ा।

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उन्होंने झुककर फोटो उठा लिया। और फिर मैंने उन्हें रोते हुए सुना। वह सिसक रही थीं। मैं तो एकदम डर गया। मन हुआ तुरंत वहां से भाग जाऊं, पर यह मुश्किल था। हरना बाबा की पत्नी फोटो हाथ में लिए हुए रो रही थीं। फिर वह कोठरी के दरवाजे पर बैठ गईं। अब मैं वहां से निकलकर नहीं भाग सकता था।
मैं अपराधी भाव से सिर झुकाए खड़ा था। क्या मैंने ही उन्हें रुला दिया था। और एकाएक मैंने अपने को उनकी गोद में गिरते हुए महसूस किया। उन्होंने मुझे पकड़कर खींचा और मेरा सिर सहलाने लगीं। वह मुझे चूम रही थीं, साथ-साथ रो भी रही थीं। उनके आंसू मेरे गालों और गरदन को गीला करने लगे। मुझे लगा जैसे मैं उनकी गोद में पकड़ा जाकर सो गया था। एकाएक झटके से मैंने अपने को उनकी पकड़ से छुड़ाया और उछलकर कोठरी से निकल आया। मैं उनकी गोदी से इस तेजी से उछला था कि उनका सिर चौखट से जा टकराया। उन्होंने दोनों हाथों से सिर थाम लिया, और मैंने देखा वह हंस रही थीं। हंसती जा रही थीं। हंसते हुए उनके पीले और बड़े दांत भयावने लग रहे थे। इसके बाद मैंने कुछ नहीं सोचा, नंगे पैर भागता हुआ गली पार करके घर में घुस आया।
एकाएक नानी ने मुझे बीच में ही पकड़ लिया। वह दहलीज में खड़ी थीं। ‘‘कहां था अब तक? मैंने कहां-कहां नहीं ढूंढ़ा!’’ वह बहुत गुस्से में थीं। ‘‘आज भूख नहीं लगी?’’
अब महसूस हुआ मैंने खाना नहीं खाया था। मेरे बदन की थरथराहट शायद नानी के हाथों में भी पहुंच गई थी। उन्होंने मेरा मुंह ऊंचा करते हुए अपनी आंखें मुझ पर टिका दीं-‘‘क्या बात है! इस तरह कांप क्यों रहा है। क्या बात है?’’
‘‘मैं...मैं...वहां था अखबारों की कोठरी में...हरना बाबा...उन्होंने मुझे पकड़ लिया था-वह...रोते हुए हंस रही थीं।’’ मैं कह गया।
‘‘सत्यानाश हो उस डायन का...मैं भी कहूं आखिर क्या बात है। वह बच्चों को इसी तरह लुभाती है। तूने उसका दिया हुआ कुछ खाया तो नहीं।’’ कहते हुए नानी ने एक जोर का थप्पड़ लगाया।
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‘‘नहीं, खाया कुछ नहीं...मुझे भूख ही नहीं थी।’’ मैंने कहा...नानी की बात मेरी समझ में नहीं आ रही थी। नानी मेरा हाथ पकड़कर खींचती हुई पड़नानी के पास ले गईं। रोती हुई बोलीं-‘‘लो देख लो, अपने बेटे को तो खा गई, पर अब दूसरों की कोख पर नजर है।’’
पड़नानी ने पूरी बात सुनकर मुझे अपनी गोद में छिपा लिया और होंठों ही होंठों में जाने क्या बड़बड़ाती रहीं। फिर मुझे समझाती हुई बोलीं-‘‘बेटा, अब हरना के घर कभी मत जाना। उसकी बीवी औरत नहीं डायन है। देखा नहीं कैसे चलती है। जब कोई नहीं देखता तो बच्चों को मिठाई देकर लुभाती है,फिर...फिर...’’ बाकी शब्द न जाने कहां खो गए। नानी और पड़नानी मेरी अपनी थीं. हरना बाबा की पत्नी गैर, पर बच्चों को पकड़ने वाली डायन क्या होती है? मैं तो उनके घर अपने आप गया था। उन्होंने मुझे कुछ भी खाने को नहीं दिया था। यह सच था कि वह डगमगाकर चलती थीं। जब उन्होंने रोते-रोते हंसना और हंसते हुए रोना शुरू किया तो उनके बड़े-बड़े दांत नजर आए थे। यह भी सच था जब उन्होंने मुझे अपनी गोद में खींचा था तो मैं डर और बेचैनी से परेशान हो गया था, लेकिन और कुछ तो नहीं किया था उन्होंने। तब नानी और पड़नानी दोनों मिलकर उन्हें गालियां क्यों दे रही थीं। डायन से उनका मतलब क्या था। यह बात मेरी समझ में एकदम नहीं आई थीं। पर एक बात तय हो गई थी कि चाहे कुछ भी हो जाए मुझे हरना बाबा की अखबार वाली कोठरी में एकदम नहीं जाना था, कभी नहीं जाना था।
अगली सुबह मैं घर से बाहर निकला तो नानी ने मुझे अपनी कसम दिला दी-अगर मैं हरना बाबा के घर के अंदर जाऊंगा तो वह अपने प्राण दे देंगी। मैं काफी देर तक अखबारों के पास नहीं गया। घर के   दरवाजे पर खड़ा-खड़ा देखता रहा। लोग हर दिन की तरह खड़े होकर, बैठकर अखबार पढ़ते हुए बातें कर रहे थे। और एक अखबार नीचे नाली में गिरा हुआ था। अखबार का एक कोना पानी में भीग चुका था। आखिर किसी को यह बात क्यों पता नहीं थी कि अखबारों को पढ़ते समय नाली के गंदे पानी में नहीं गिराना चाहिए।
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हरना बाबा ने एक-दो बार मेरी ओर देखा तो मैं दरवाजे की ओट में हो गया। देखने पर शायद वह मुझे आवाज देकर बुला सकते थे। असली मुश्किल दोपहर में हुई। अखबार चबूतरे पर पड़े फड़फड़ाते और इधर-उधर उड़ते रहे। मेरा मन कर रहा था, और कुछ न सही कम से कम अखबारों को करीने से एक दूसरे के ऊपर रखकर उन्हें पत्थर के टुकड़े से तो दबाया ही जा सकता है। लेकिन ऐसा करना मुश्किल था ।क्योंकि उनके घर के जालीदार किवाड़ों से अंदर-बाहर का सब कुछ दिखाई देता था। हरना बाबा की पत्नी मुझे देखकर अगर अंदर बुलातीं तो मैं मुश्किल में पड़ सकता था।
कई दिन बीत गए। मैं चाहकर भी अखबारों के पास नहीं जा पाता था। एक सुबह मैं घर के दरवाजे पर खड़ा अखबार पढ़ते हुए लोगों की ओर देख रहा था तो मैंने पाया हरना बाबा मुझे इशारे से बुला रहे हैं। मै दौड़कर उनके पास जा पहुंचा। उन्होंने कहा-‘‘जरा मेरे साथ बाजार चल।’’ फिर मेरा हाथ थामकर बढ़ चले। पर मुझे अपने घर के अंदर नहीं ले गए। आर्य समाज की गली पार करके बाजार की ओर बढ़ते हुए मैं सोच रहा था-शायद हरना बाबा अब पूछेंगे कि मैं अखबार संभाल कर रखने के लिए उनके घर क्यों नहीं आता था? सुबह लाइब्रेरी में आकर अखबार क्यों नहीं पढ़ता था? मैं मन ही मन उनके इन सवालों के जवाब सोचने की कोशिश कर रहा था, पर हरना बाबा ने मुझसे कुछ नहीं पूछा। बाबा मुझे लेकर हलवाई की दुकान पर गए। वहां उन्होंने ढेर सारी पूरियां, मिठाई और सब्जी ली और केले खरीदे। कुछ सामान मुझे पकड़ा दिया। बाकी अपने हाथ में लेकर चलते रहे। हम एक बड़े फाटक के सामने जाकर रुके। अंदर से बच्चों के चीखने-चिल्लाने की आवाजें आ रही थीं। एक बड़े आंगन में कबूतरों के झुंड दाना चुग रहे थे।

                             9

मैं समझने की कोशिश कर रहा था कि हरना बाबा मुझे वहां क्यों लाए हैं? अब उन्होंने कहा-‘‘तेरी दादी की तबियत कल से एकाएक बिगड़ गई है। न जाने क्या बात है। इसीलिए मैं यहां अनाथालय के बच्चों को खाना खिलाने आया हूं। वह जब भी बीमार होती हैं तो मैं यहीं आता हूं।’’
एक घनी दाढ़ी- मूंछ वाला आदमी आया तो हरना बाबा उससे बात करने लगे। उसकी आंखें बड़ी-बड़ी और लाल थीं। वह हाथ में एक छड़ी लिए हुए था। रह-रहकर छड़ी को वह अपने पैरों पर मारता था। तभी कहीं अंदर से चीखने की आवाज आई तो उसने हरना बाबा से कहा-‘‘मैं अभी आया।’’ और उसके अंदर जाते ही रोने की आवाजें आने लगीं। कोई किसी को मार रहा था। कुछ देर बाद वही दाढ़ी वाला मेरे जैसे एक बच्चे को पकड़कर बाहर लाया और छड़ी से पीटने लगा। नानी कभी-कभी मुझे मारती थीं लेकिन किसी दूसरे के सामने नहीं। तो क्या वह दाढ़ी वाला उस बच्चे का या वह बच्चा उसका कोई नहीं था? आखिर उसने छड़ी फेंक दी और नाम लेकर पुकारने लगा। बच्चे एक-एक करके बाहर आने लगे। दाढ़ी वाले ने फिर छड़ी उठा ली और इशारा करते हुए बच्चों से बोला-‘‘सब एक लाइन में खड़े हो जाओ। कोई जरा भी हिला तो चमड़ी उधेड़ दूंगा।’’
सब बच्चे एक लाइन में खड़े हो गए। मैंने देखा वे मेरी ओर देख रहे थे। सबके कपड़े फटे हुए थे और वे नंगे पैर थे। उन्हें देखकर मुझे ठंड लगने लगी। दाढ़ी वाले ने छड़ी से इशारा किया तो बच्चे पुतलों की तरह नंगी जमीन पर बैठ गए, वहीं दाना चुगते कबूतरों के बीच। कबूतर एक बार फड़फड़ करते हुए उड़े और फिर दाना चुगने लगे। शायद बच्चों से कबूतर डरते नहीं थे। दाढ़ी वाला एक-एक बच्चे का नाम पुकारता तो वह आगे आता। हरना बाबा बच्चे के हाथ में चार पूरियां, सब्जी का दौना और एक केला थमा देते। बच्चे वहीं कबूतरों के बीच बैठकर खाने लगे। वह दाढ़ी वाला आदमी बाबा को अंदर कमरे में ले गया। मैं कुछ देर तक दाना चुगते कबूतरों और जल्दी-जल्दी पूरियां खाते हुए बच्चों को देखता रहा। हरना बाबा अंदर बैठे उससे बातें कर रहे थे। मैं यूंही उस लंबे-चौड़े आंगन में खड़ा था। एक पल के लिए अखबार वाली कोठरी की तस्वीर आंखों में तैर गई। बदन में झुरझुरी सी हुई। बाबा बता रहे थे कि उनकी पत्नी बीमार थीं। आखिर क्या हो गया था उन्हें।
                              10

हरना बाबा को अंदर गए बहुत देर हो गई थी। मैं टहलता हुए तीन-चार सीढि़यां चढ़कर चबूतरे पर पहुंच गया। उसके एक छोर पर एक बड़ा कमरा बना हुआ था। वहां से अखबार और किताबें नजर आ रही थीं। मैं कुछ पल सहमता सा बाहर खड़ा रहा फिर धीरे-धीरे अंदर की ओर बढ़ा। मैं यह तय नहीं कर पा रहा था कि मुझे अंदर जाना चाहिए या नहीं।
अंदर एक बहुत लंबा और बड़ा कमरा था, जिसकी छत बहुत ऊंची थी। उसमें भी हमारे घर की छत की तरह काले रंग की लकडि़यां लगी हुई थीं। कमरे के बीचों-बीच एक लंबी मेज पड़ी थी, जिस पर अनेक अखबार बिखरे हुए थे। अखबारों के सामने कोई पढ़ने वाला नहीं था। हां, एक तरफ कुर्सी पर बैठा एक आदमी ऊंघ रहा था। कमरे में सब तरफ ऊंची-ऊंची अलमारियां थीं-किताबों से भरी हुईं, लेकिन उन पर ताले पड़े थे। उस कमरे के पीछे एक अंधेरा कमरा और नजर आ रहा था, उसमें भी किताबें ही किताबें बिखरी पड़ी थीं। बाप रे, इतनी किताबें और पढ़ने वाला कोई नहीं।
तभी आवाज आई-‘‘ऐ कौन?’’
मैं जरा पीछे हटा, फिर न जाने कब मेरे होंठों से निकल गया-‘‘ये अखबार...’’
‘‘हां, तो क्या हुआ! अखबार क्या दरवाजे पर खड़े होकर पढ़े जाते हैं, अंदर आकर आराम से बैठो और पढ़ो।’’ यह कुर्सी पर ऊंघते हुए आदमी ने कहा था। वह चश्मे के पीछे से झांकती बड़ी-बड़ी आंखों से मुझे घूर रहा था।
कुछ पल मैं ठिठका हुआ दरवाजे पर खड़ा रहा, फिर बढ़कर एक कुर्सी पर बैठ गया। मेरे सामने थी एक लंबी काली मेज जिस पर ढेर सारे अखबार फैले हुए थे। वहां बैठते ही मुझे हरना बाबा की याद आई। गली के चबूतरे पर थोड़े ही अखबार होते थे-अखबार कम और पढ़ने वाले ज्यादा। पर यहां तो मेरे अलावा कोई पढ़ने वाला था नहीं। जिसके कंधों पर अखबार पढ़वाने की जिम्मेदारी थी, वह कुर्सी पर ऊंघ रहा था।

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एक पल के लिए मुझे कुछ डर सा लगा। चारों ओर छत तक ऊंची तालाबंद अलमारियों में लाल-नीली व काली जिल्दों वाली पुस्तकें थीं जिन्हें मैं छू नहीं सकता था, क्योंकि बीच में शीशे वाले पल्ले थे। छत से लटकते पंखे खटखट करते हुए हिल रहे थे। झरोखों में बैठे कबूतर गुटरगूं कर रहे थे। अखबारों पर जगह-जगह बीट के छींटे पड़े हुए थे।
तभी कुर्सी पर बैठे आदमी ने इशारे से मुझे पास बुलाया और एक पुरानी किताब मुझे थमाकर बोला-‘‘इसे पढ़ो, अच्छा लगेगा।’’ पीले चुरमुर पन्नों वाली किताब को छूते ही डर लगा क्योंकि उसके पन्ने जगह-जगह से फटे हुए थे। मैं पढ़ने लगा। उसमें एक ऐसे लड़के का जिक्र था जिसकी ऊंचाई केवल हाथ के अंगूठे के बराबर थी। पढ़ते-पढ़ते मैं जैसे कहीं दूर निकल गया। मैं और साथ में वही हाथ के अंगूठे जितना बड़ा लड़का। एक जंगल में मैं और अंगूठे जितना बड़ा लड़का खड़े थे। शायद हम कहीं जा रहे थे, फिर एकाएक कानों में अपना नाम आया। देवन...देवन...कहां चला गया!’’
अरे, यह तो हरना बाबा की आवाज थी। मैंने देखा वह आंगन में खड़े मुझे पुकार रहे थे। मैंने किताब को वहीं छोड़ दिया और भागता हुआ बाहर आ गया। आंगन में बिखरी धूप में कबूतर फुदक रहे थे। पूरी और डंडे खाने वाले बच्चे अब दिखाई नहीं दे रहे थे। हरना बाबा मेरा हाथ थाम कर घर की ओर लौट चले। उस रात देर तक नींद नहीं आई। बार-बार लगता मैं किताब वाले अंगूठे जितने बड़े लड़के के साथ न जाने कहां चला जा रहा हूं। अगर हरना बाबा ने बीच में पुकार न लिया होता तो मैं ज्यादा देर तक उस अनोखे लड़के के साथ रह सकता था।

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हमारे मकान के ऊपरी हिस्से में बारुमल रहते थे। वह बर्फ बेचने का काम करते थे। गंजा सिर और लंबी सफेद मूंछें। बूढ़े थे, पर मोटे-ताजे दिखते थे। उस मकान में जितने भी बच्चे थे, बारुमल उनकी पहली पसंद थे, क्योंकि उन्हें असंख्य कथाएं याद थीं। जानी चोर, निहाल दे-सुल्तान की रोमांचक कथाएं वही हमें सुनाया करते थे। वह गर्मियों में रात को देर से घर लौटते थे, तब तक हम सब कहानी बाबा की प्रतीक्षा में जागते रहते। ठंडी छत पर, चांद-तारों को निहारते हुए नींद के झोंके आते और बारुमल हमें कथा लोक में ले जाते। कथा शुरू करने से पहले वह कह देते थे-हुंकारा भरना होगा। जो बच्चा कहानी खत्म होने से पहले सो जाएगा, अगले दिन से उसकी छुट्टी।

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फिर भी मैं कहानी खत्म होने से पहले ही सो जाता था। बीच-बीच में उनके हुक्के की गुड़गुड़ लोरी की तरह सुनाई देती थी। एक दिन मैंने तय कर लिया था आज उनसे अंगूठे जितने बड़े लड़के की कहानी सुनूंगा। उन्हें जरूर याद होगी। वह आए, पानी से भीगी ठंडी छत पर उन्होंने शीतलपाटी बिछाई तो मैंने कहा-‘‘बाबा, आज अंगूठे जितने बड़े लड़के की कहानी सुनाओ।’’
सुनकर वह जोर से हंसे। बोले, ‘‘ऐसा तो कोई लड़का नहीं होता, न ही मैं ऐसी कहानी जातना हूं। तू जानता है तो मुझे सुना दे।’’
‘‘लेकिन मैंने ऐसे लड़के की कहानी किताब में पढ़ी है।’’ मैं कह गया। 
‘‘तो वही सुना दे।’’
‘‘मैंने थोड़ी सी ही पढ़ी है’’, कहते हुए उस अंगूठे जितने बड़े लड़के की कहानी सुनाने लगा, फिर न जाने कब नींद आ गई।
सुबह आंख खुली तो वही किताब वाला लड़का मेरे साथ था। मैंने बहुत कोशिश की, पर उसने मेरा पीछा नहीं छोड़ा। मेरे स्कूल का रास्ता उसी बाजार से होकर था जहां एक बड़े फाटक के अंदर अनाथालय और पुरानी किताबों वाली लायबे्ररी थी।
बड़े फाटक के सामने पहुचते ही लगा जैसे किताब वाला लड़का मुझे इशारे से बुला रहा हो। मेरे कदम आप से आप अंदर चले गए। पिछले दिन की तरह लायबे्ररी में सिर्फ वही आदमी कुर्सी पर बैठा था। मैं हिचकता-सा बाहर खड़ा रहा। मैंने देख लिया था कि कल मैं मेज पर किताब को जहां छोड़ गया था वह वहीं रखी है। शायद मेरे बाद कोई और नहीं आया था।‘‘वह किताब कहां है जो मैंने तुम्हें पढ़ने को दी थी? उसे घर क्यों ले गए? किताबें घर ले जाना मना है।’’ उसने चश्मे के पीछे से बड़ी-बड़ी आंखें चमकाते हुए कहा।
‘‘मैं किताब यहीं छोड़ गया था। वह रखी है।’’ मैंने मेज पर रखी किताब की ओर इशारा किया तो वह खामोश हो गया। मैंने बस्ता जमीन पर टिका दिया और स्टूल पर बैठ कर किताब पढ़ने लगा। पन्ने पलटते हुए मैं जल्दी ही उस जगह जा पहुंचा जहां कल अंगूठे जितने बड़े लड़के से अलग हुआ था। अंगूठे जितना बड़ा लड़का एक पेड़ के नीचे खड़ा जैसे मेरी ही राह देख रहा था। उसने मेरा हाथ पकड़ा और हम दोनों जंगल में आगे बढ़ चले।
जब मैंने किताब खत्म की तो दोपहर होने को आ रही थी। और मैं स्कूल नहीं गया था। वैसे यह पहली बार नहीं था। कई बार जब मेरा मन नहीं होता था और नानी मुझे स्कूल भेजने पर तुली होती थीं तो मैं स्कूल न जाकर कहीं भी चला जाता था। और बहुत बार इसीलिए भी स्कूल नहीं जाता था कि गणित के मास्टर जयपाल सिंह बहुत मारते थे। वह नीले रंग का कुरता पहनते और टोपी लगाकर आते थे। क्लास में बीड़ी पीते रहते थे। पूछने पर सिर्फ थप्पड़ और घूंसे मारते थे और गणित मुझे नहीं आता था। घर में नानी को भी गणित की आफत की जानकारी नहीं थी। इसका सबसे आसान तरीका यह था कि मैं स्कूल ही न जाऊं।
मुझे रेल स्टेशन जाना पसंद था। उन दिनों नई दिल्ली रेलवे स्टेशन बहुत छोटा था। बिना शेड वाला लंबा प्लेटफार्म जिस पर लाल बजरी बिछी हुई थी। आज जो एक छोटी सी गुमनाम गुमटी नजर आती है, वही स्टेशन की इमारत थी। तब के स्टेशन की शायद किसी को याद भी न हो कि वह कभी स्टेशन था। मैं अक्सर ही पुल पर जाकर खड़ा हो जाता। और सामने दो सांपों की तरह बिछी पटरियों को देखता रहता था। नीचे से जब गाड़ी गुजरती थी तो इंजन की काली, गीली भाप में भीगते हुए वहां खड़े रहने का अपना ही मजा था। लगता था जैसे भाप के बादल पर सवारी करता हुआ आकाश में बहुत ऊपर उठ गया हूं। लेकिन फिर इंजन के गुजर जाने के बाद मुझे नीचे तो उतरना ही होता था। और दिन छिपने से पहले घर लौटकर नानी को स्कूल का पूरा हाल बताना भी जरूरी था, जो झूठ होता था। मैं जिन यात्राओं पर निकला करता था वहां क्या मैं नानी को ले जा सकता था। नहीं, कभी नहीं।
पर अब और कहीं जाने की जरूरत नहीं थी। मैं बड़े आराम से स्कूल के रास्ते से उड़न छू होकर किताबों की दुनिया में जा सकता था। और वही मैं करता भी था। किताबों की दुनिया भी कितनी विचित्र और रहस्य भरी थी। शुरू-शुरू में सब सच लगता था। और मैं एक के बाद दूसरी किताब पढ़ता हुआ अपने आस-पास से दूर और दूर होता जाता था। लायबे्ररी के एकांत में पढ़ी हुई किताबों के नाम आज याद नहीं रह गए हैं। मैं यह भी नहीं जानता कि वे कितनी और किस विषय की थीं। क्या इतना काफी नहीं था कि किताबें मुझे अपने अंदर छिपा लेती थीं। मेरी आंखों के सामने नई दुनिया हर रोज बनती-बिगड़ती थी।===                                             ( आगे और है)
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12 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत ही सुंदर ढंग से लिखी गई मर्मस्पर्शी आत्मकथा का यह अंश ,बीच में छोड़ने की इच्छा ही नहीं हो रही थी।

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  2. नमस्कार, मैं आभारी हूँ. रचना को पाठक की दृष्टि मिल जाए तो लिखना सार्थक हो जाता है.

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  3. आप अपने साथ चल रहे हैं और हम दूर रहते हुए भी आपके साथ चल रहे हैं..कैसा संजोग है..बहुत बहुत बधाई इतने सुन्दर ब्लॉग के लिए..सादर र.तै..

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  4. आप अपने साथ चल रहे हैं और हम दूर रहते हुए भी आपके साथ चल रहे हैं..कैसा संजोग है..बहुत बहुत बधाई इतने सुन्दर ब्लॉग के लिए..सादर र.तै..

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  5. भूगोल की दूरियां मानसिक तरगों के संचरण में कभी बाधा नहीं बन सकती .वैसे भी में अपने साथ नहीं आपके साथ हूँ हमेशा से और हमेशा ही रहूँगा.

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  6. आज इस आत्मकथा की दूसरी कड़ी की मेल देखकर इसे शुरू से पढ़ने की इच्छा यहाँ ले आई। माफी चाहता हूँ कि इस कड़ी को मैं तुरन्त नहीं पढ़ पाया था। बहुत सुन्दर। बचपन में इतनी बारीकी से उतरना सबके लिए सम्भव नहीं है। इस आत्मकथा को पढ़कर मुझे लगता है कि मुझ जैसा व्यक्ति बहुत-कुछ सीख सकता है। बहुत-सी नई जानकारियाँ भी इस बहाने मिल गई हैं।

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    1. बलरामजी,धन्यवाद.में मास्टर नहीं मित्र हूँ.

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    2. प्रभात भाई, रचना के माध्यम से परिचय हो रहा है,इससे अच्छी बात और क्या हो सकती है

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  7. मेरे गुरूजी द्वारा फेसबुक पर साझा की गयी आपकी या आत्मकथा भाग 2 तक पहुंचा..परन्तु भाग 1 न पढ़ा होने की वजह से मुझे कुछ अधूरा सा लगा इसलिए मैंने भाग -1 पढना शुरू किया...पता ही नहीं चला कि कब पढना शुरू किया और देखते ही देखेते अंत हो गया.. आपकी आत्मकथा हर वाक्य में कई बार उसी के अनुसार विचरण कराती रही, कभी वो काले छत तो कभी औरत...अच्छा अनुभव और आपकी लेखनी का सुन्दर अहसास रहा...जल्दी ही भाग-2 पढूंगा..आभार मेरे गुरूजी का और आपका भी!

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  8. हम दोनों के बीच पुल बनाने वाले आपके गुरूजी को धन्यवाद.एक रचना दो अनजान लोगों को कैसे आपस में जोडती है यह किसी चमत्कार से काम नहीं.

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  9. अत्यंत रोचक,सरल,सरस शैली।

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  10. सुभाषजी,नमस्कार.आपने शैली की बात कही, पर मेरा सारा ध्यान कथ्य की ओर रहता है. मैं कहानी के पीछे- पीछे चलता हूँ.सच मानिए यह यात्रा मुझे अनजान गलियों में ले जाती है.उसका एक अलग ही रोमांच होता है. शैली कैसी होनी चाहिए यह फैसला विद्वान करते हैं.

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