मंगलवार, 22 मार्च 2016

आत्म कथा 10



अपने साथ

       -देवेन्द्र कुमार
आत्म कथा – 10 

नौवीं क़िस्त – पृष्ठ 112 से 125 तक अब आगे पढ़ें

हरना बाबा चले गए थे. एक सुबह चबूतरे से अखबार गायब मिले.शास्त्री जी ने कहा कि अखबार उन्होंने रखे थे. आखिर किसने गायब किये थे अखबार? नानी ने शास्त्री जी से अखबार लिया और चबूतरे पर बैठ कर पढने लगीं.  यह करतूत लट्टू चौधरी की थी. वह लाइब्रेरी को बंद कराना चाहते थे.लेकिन नानी ने उनकी चाल सफल न होने दी. नानी मेरे साथ गली में मौजूद रहती थीं. अब लाइब्रेरी ठीक चल रही थी. शास्त्रीजी रशीद की बीमार बेटी जूही का इलाज कर रहे थे.एक दिन मैं भी साथ चला गया. मुझे आगरा वाली जूही याद आ रही थी रशीद की बेटी उस जूही जैसी लग रही थी. क्या दोनों आपस में बहनें थीं?मैं पूछना चाहता था लेकिन .....

पता नहीं क्या बात थी, आज फातिमा बहुत गुस्से में थी।  पहली बार जब मैं शास्त्री जी के साथ आया था तो वह कैसे मीठा बोल रही थी, लेकिन आज...कहीं ऐसा तो नहीं कि मैंने दूध फटने की बात कहकर उसे नाराज कर दिया था। मैं कुछ देर बंद दरवाजे के सामने खड़ा रहा। अंदर से चीखने की आवाजें आ रही थीं। एक आवाज फातिमा की थी। वह जूही को डांट-फटकार रही थी। पता नहीं क्यों? फिर रोने की धीमी आवाज आई। वह जूही ही होगी। क्या फातिमा उसे मुझसे बात करने के लिए डांट रही थी।
आखिर क्यों? मैंने जूही से उसका हाल-चाल ही तो पूछा था। क्या फातिमा जूही को मार रही थी? क्या वह भी जुबैदा जैसी ही थी, जिसे अपनी बीमार बेटी की जरा भी चिंता नहीं थी। अगर मैं बीमार होता तो नानी मुझे कुछ भी न कहतीं। मुझसे वहां खड़ा न रहा गया। मैं मुड़कर चल दिया, फिर जैसे कुछ ध्यान आया। मान लो, मैं अगर फिर कभी यहां आऊं तो...जूही के घर को कैसे पहचानूंगा। मैंने जमीन पर पड़ा एक कोयले का टुकड़ा उठाया और बंद दरवाजे के पास दीवार पर एक गोला सा बना दिया। आसपास कोई न था। फुटबाल की बात पर जमा हुई भीड़ जाने कहां चली गई थी। चलते-चलते पीछे मुड़कर देखा, दीवार पर कोयले से बना गोल निशान साफ दिखाई दे रहा था। हां, फिर कभी आना हुआ तो किसी से पूछूँगा नहीं, इसी निशान से पहचान लूंगा। लेकिन क्या कभी फिर आ सकूंगा? मैं चलते-चलते सोचता जा रहा था। गली से बकरियों का झुंड जा रहा था। मैं बीच में खड़ा था।

नानी ने पुकारा और मेरे हाथ में एक लिफाफा पकड़ा दिया। बोलीं-‘‘पढ़ ले, विद्या की चिट्ठी है। तेरी मां।’’
‘‘तो मैं क्या करूं।’’
‘‘एक पत्थर लाकर मेरा सिर फोड़ दे अभागे।’’ नानी को गुस्सा आ गया।
मैं चुप खड़ा रहा। एकाएक नानी ने मुझे गोद में भर लिया और रोने लगीं।

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‘‘तू उसके साथ ऐसा क्यों करता है? उसने क्या बिगाड़ा है? अरे, जिंदगी तो उसकी बरबाद हुई।’’ और फिर आंचल से आंख-नाक पोंछने लगीं। मैं चिट्ठी लेकर तिमंजिले पर चला आया। मोहन की छत पर कोई नहीं था। कोना खाली था। और हो भी क्या सकता था। कितना धोखेबाज था मोहन। मुझे गुस्सा आ गया। मां की चिट्ठी अभी मेरे हाथ में थी। पता नहीं मन में क्या आया-चिट्ठी के दो टुकड़े करके हवा में उछाल दिए। चिट्ठी का एक हिस्सा उड़ता हुआ छत के कोने में जा गिरा। मैंने उसे उठाया और पढ़ने लगा। भला कैसे पढ़ा जा सकता था। कोई लाइन पूरी न थी। एक लाइन पढ़ना शुरू करता तो फिर कोई जैसे गड्ढे में गिरा देता। एकाएक लगा मुझे चिट्ठी पढ़नी चाहिए थी। उसे फाड़ना ठीक नहीं था। अगर यह बात मैंने नानी से कह दी तो वह बहुत नाराज हो जाएंगी।
मन हुआ कि पूरी चिट्ठी पढूं। लेकिन चिट्ठी को तो मैंने ही फाड़ा था। मैं आधा हिस्सा हाथ में लिए खड़ा था। याद नहीं आ रहा था कि चिट्ठी का दूसरा हिस्सा मैंने कहां फेंक दिया था। मैंने फटी हुई चिट्ठी कई बार पढ़ी। हर लाइन में बात अधूरी थी। मैं अपने को गाली देने लगा। भला मैंने मां की चिट्ठी क्यों फाड़ दी। उस दिन मां मुझसे मिलकर जाना चाहती थीं लेकिन मैं ही उनसे दूर भागता रहा था, और हरना बाबा के घर की अखबारों वाली कोठरी में छिपकर बैठ गया था। नानी के बार-बार पुकारने पर भी मैं वहीं बैठा रहा था। बाहर निकलकर नहीं आया था। और अब उनकी चिट्ठी भी फाड़ दी थी।
मां का चेहरा आंखों के सामने तैर गया। मैंने उन्हें अपने सामने कभी हंसते हुए नहीं देखा था। अकसर ही उनकी आंखें लाल रहती थीं और उनमें आंसू चमकते रहते थे। जबकि नानी, पड़नानी और घर के दूसरे लोग तो दिन में कई बार हंसते थे। जिन बातों पर नानी को हंसी आ सकती थी, क्या उन पर मां नहीं हंस सकती थीं! आखिर अपनी हंसने की आदत कहां रख दी थी उसने। मां के बारे में नानी बताती थीं कि अपने बचपन में वह बहुत चंचल और हंसमुख थी।
मन हुआ उड़कर मां के पास पहुंच जाऊं...और...लेकिन पहले उनकी चिट्ठी तो पढ़ लूं। पर कैसे? मैं मुंडेर पर से उचककर मोहन की छत पर झांकने लगा। छत पर कोई न था। शायद चिट्ठी का आधा हिस्सा उधर ही जा पड़ा हो। मैं दूसरी तरफ कूद गया। इधर-उधर देखा पर मां की चिट्ठी का फटा हुआ हिस्सा कहीं दिखाई न दिया। कहीं हवा में उड़कर पिछली गली में न जा गिरा हो, यह सोचता हुआ मैं मोहन की छत पर से झुककर गली में झांकने लगा, पर कुछ पता न चल सका। जहां मैं खड़ा था वहां से मोहन के कमरे का दरवाजा दिखाई देता था। मुझे ऐसा लगा जैसे दरवाजा खुला हुआ है। मतलब यह कि मोहन अपने घर में मौजूद था। नानी से अपने माडल, रेल इंजन झूठ बोलकर ले गया था। आज मौका था, मैं उसे पाठ पढ़ा सकता था। मुझे फंसाकर कैसी सफाई से भाग निकला था। बदमाश कहीं का। मैंने और कुछ नहीं सोचा। मां की चिट्ठी को ढूंढ़ने की बात भी दिमाग से निकल गई। मैं तेजी से सीढि़यां उतरकर उसके कमरे के सामने जा खड़ा हुआ।

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हां, मैंने ऊपर से ठीक देखा था। दरवाजा खुला हुआ था। अंदर रोशनी थी। एक आदमी पलंग पर बैठा हुआ था। यह तो वही था जिसके साथ एक दिन मैंने मोहन और उसकी मां को जाते हुए देखा था। वहां एक औरत बैठी खाना बना रही थी, लेकिन वह मोहन की मां तो नहीं थी। तो फिर वह कौन थी? मोहन और उसकी मां कहां थे?
तभी उस आदमी ने पुकारा-‘‘कौन है?’’ मैं धीरे-धीरे अंदर चला गया।
‘‘मोहन...।’’ मैंने कहा।
‘‘मोहन तो यहां नहीं रहता। तुम कौन हो?’’ खाना बनाती हुई औरत ने पूछा। ‘‘बैठो, कहां से आए हो?’’
वह सुंदर थी और बोलते समय हंस रही थी। बात करते-करते पतीली में कड़छी चलाती जा रही थी। कमरे में मसालों की गंध भरी थी।
‘‘मैं पीछे वाले मकान में रहता हूं। मोहन से कुछ काम था।’’
‘‘मोहन तो यहां रहता नहीं।’’ उसने कहा। कमरे में सामान करीने से लगा हुआ था और कोने में रखे बरतन चमक रहे थे।
तभी पलंग पर बैठा आदमी बोल उठा-‘‘हमें क्या पता कहां गया है? तुमसे कुछ पैसे उधार लिए थे क्या? जरूर लिए होंगे। दोनों मां-बेटे ऐसे ही थे। लेकिन मैं साफ कहे देता हूं, मैं उसका उधार चुकाने वाला नहीं। और हां, आज के बाद मोहन को पूछने के लिए यहां मत आना।’’
मुझे याद आया जब मोहन और उसकी मां हमारी गली से जा रहे थे तो यह उनके आगे-आगे था। क्या मोहन इसका कोई नहीं। तब उस दिन मोहन और उसकी मां इसके साथ क्यों जा रहे थे? और यह औरत...यह कौन? आखिर मोहन और उसकी मां कहां गए?
एकाएक वह आदमी चारपाई से उठ खड़ा हुआ। उसने खाना बनाती हुई औरत से कहा-‘‘श्यामा, मैं काम से जा रहा हूं। लौटकर आऊंगा तो बाजार चलेंगे।’’
‘‘जल्दी आना।’’ कहकर श्यामा आंचल से मुंह पोंछने लगी। वह आदमी मेरी ओर देखे बिना कमरे से बाहर चला गया।
मैं समझ गया इन लोगों से मोहन का पता चलने वाला नहीं। अब मेरा यहां रुकना बेकार था। मैं चलने के लिए मुड़ा तो श्यामा ने कहा-‘‘बैठो बेटा। बताओ, क्या बात है।’’ मैं बैठ गया।

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‘‘सच-सच कहना, क्या मोहन ने तुमसे पैसे उधार लिए थे? कितने लिए थे?’’
‘‘जो लिए थे, लौटा दिए। मैं तो बस उससे मिलना चाहता था। इसलिए पूछ रहा था।’’ मैंने कहा।
‘‘क्या तुम दोनों साथ-साथ पढ़ते हो?’’
‘‘नहीं, बस ऐसे ही...।’’ मेरा मन हुआ कि बता दूं मोहन ने कितनी चालाकी की थी मेरे साथ। किस तरह अपने बनाए माडल और चित्र मुझे देने के बाद वापस ले गया था।
मैं उठ खड़ा हुआ। भला वहां और बैठने में फायदा ही क्या था। लेकिन बाहर निकलने से पहले ही श्यामा ने फिर पुकार लिया-‘‘सुनो बेटा, तुमसे एक काम है।’’
‘‘मुझसे...का...।’’
‘‘तुम और मोहन दोस्त हो न।’’
मैं चुप रहा, वैसे मैं कहना चाहता था कि मैं और मोहन कभी दोस्त नहीं थे। उसने मुझे धोखा दिया था। वह मेरा दोस्त कैसे हो सकता था।
श्यामा ने मेरे हाथ में एक छोटा-सा परचा थमा दिया। बोली-‘‘मेरा एक काम कर दो। तुम्हें मोहन और उसकी मां इस पते पर मिल जाएंगे। मुझे पता है मोहन की मां बीमार है। इस परचे पर सुनारों वाली धर्मशाला का पता है। वहीं टिके हुए हैं दोनों मां-बेटे। तुम जाकर ये पैसे मोहन की मां को दे देना। चाहे वह कितना भी पूछें भूलकर भी मेरा नाम मत लेना।’’ उसके हाथ में कुछ नोट थे।
‘‘आप अपने आप क्यों नहीं चली जातीं!’’ मैंने कहा।
श्यामा की आंखें फैल गईं। बोली-‘‘मोहन की मां तो मेरा मुंह भी नहीं देखेगी। वैसे हम दोनों बचपन की सहेलियां हैं, पर अब...खैर, उस बात का क्या कहना। बोलो करोगे मेरा यह काम?’’
‘‘वह भला क्यों लेंगी मुझसे। और फिर मोहन से मेरा झगड़ा भी तो हो चुका है, पूछेंगी तो क्या कहूंगा?’’
‘‘अरे कुछ भी कह देना। कह देना किसी ने ये पैसे पहुंचाने के लिए दिए हैं।’’ कहकर श्यामा ने मेरे हाथ में दस-दस के कुछ नोट थमा दिए। फिर आंचल से हाथ पोंछने लगी।
मैं सोचने लगा-जब यह अपने को मोहन की मां की सहेली बता रही हैं तो खुद क्यों उससे मिलने नहीं जाती। यही सोचता हुए मैं कमरे से बाहर निकल आया। कमरे के अंदर से आवाज आई-‘‘बेटा, पैसे देना मत भूलना।’’
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मैंने कोई जवाब नहीं दिया और छत पर वापस आ गया। फिर मुंडेर फांदकर अपनी छत पर चला आया । लेकिन तभी नानी की पुकार सुनाई दी। ‘‘ओ देवन, कहां चला गया?’’ मैं तेजी से सीढि़यां उतरने लगा। और नीचे आते-आते मैंने निश्चय कर लिया था कि श्यामा के दिए रुपए मोहन के पास नहीं ले जाऊंगा।
मैंने नानी से कुछ नहीं कहा। मुझे बाद में पता चला कि उन्होंने मुझे छत की मुंडेर फांदकर आते देख लिया था। वह बार-बार पूछती रहीं, पर मैं कहता रहा-‘‘मैं तो अपनी छत पर था। सामने पीपल पर बंदर उछल-कूद कर रहे थे, वही देख रहा था।’’
नानी ने बार-बार पूछा तो मैं गली में निकल आया। हरना बाबा का चबूतरा सूना था। उस पर अखबार नहीं थे। क्योंकि मुजफ्फरपुर जाते समय उन्होंने मुझसे केवल सुबह ही लायब्रेरी खोलने को कहा था। वैसे हरना बाबा तो शाम को भी अखबार चबूतरे पर रखते थे, पर शाम को अखबार जल्दी उठा लिए जाते थे। गली में बिजली थी, पर इतनी नहीं कि उस रोशनी में अखबार पढ़े जा सकें। लट्टू चौधरी हाथ में डंडा थामे अपनी जगह बैठे थे। आते-जाते लोग उन्हें नमस्कार कर रहे थे। मैं सोच रहा था-कैसे चौ धरी हैं गली के। जो यह करें वह ठीक और बाकी सब गलत। क्या इन्हें इस तरह लाइब्रेरी बंद करने की कोशिश करनी चाहिए थी। लायब्रेरी से लट्टू चौधरी को फायदा ही था। अखबार पढ़ने के लिए आने वाले लोग भी उन्हें नमस्कार करते थे, पर फिर भी पता नहीं क्यों वह हरना बाबा की लायब्रेरी बंद कराना चाहते थे। भला इसमें उनका क्या नुक्सान था। अखबारों का सारा खर्च हरना बाबा खुद उठाते थे। लट्टू चौधरी ने तो कभी लायब्रेरी के लिए एक भी पैसा नहीं दिया था। वह तो नानी ने हिम्मत दिखाई थी, नहीं तो चौधरी सचमुच लायब्रेरी को जरूर बंद करा देते।
वैसे नानी किसी से ज्यादा बात नहीं करती थीं, अक्सर घर में ही रहती थी, पर थीं बहुत हिम्मती। उन्होंने लट्टू चौधरी का खूब मुकाबला किया था और वह जीत गई थीं। आखिर वह फारेस्ट आफिसर नाना की पत्नी जो थीं। उन्होने मुझे बताया था कि नाना ने 30 शेर मारे थे। हो सकता है, नानी भी एक-दो बार नाना के साथ शिकार पर गई हों। तभी तो उनमें इतनी हिम्मत थी।
तभी मेरा हाथ नेकर की जेब में जा पहुंचा और श्यामा के दिए नोटों को छुआ। मैंने झट हाथ बाहर निकाल लिया। मैं कभी नहीं जाऊंगा मोहन की मां को पैसे देने के लिए। क्यों जाऊं! अच्छा है, वह बीमार होंगी तो मोहन खूब परेशान होगा। होता रहे परेशान। उसे परेशान होना ही चाहिए। ओफ कितना बड़ा धोखा दिया था उसने मुझे।
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मेरी आंखों के सामने एक दृश्य उभर आया- -धर्मशाला के अंधेरे कमरे में मोहन की मां बीमार पड़ी हैं और मोहन परेशान सा उसके पास बैठा है। लेकिन फिर मन में जैसे कुछ होने लगा। मान लो अगर मेरी मां इस तरह बीमार पड़ी हों और मोहन की जगह मैं उनके पास बैठा हूं और मेरे पास मां की दवा लाने के लिए पैसे न हों तो फिर...
इस दृश्य को मैंने जबरदस्ती परे ठेल दिया। ऐसा हो ही नहीं सकता कि बीमार मां और मैं साथ-साथ मौजूद हों। अगर ऐसा संभव होता तो मां भला मुझे छोड़कर जाती ही क्यों।
न कभी ऐसा हुआ है और न कभी होगा, इस बात का मुझे पक्का विश्वास था। मैं यही सब सोचता खड़ा रहा, पर मेरा यह निश्चय नहीं डिगा कि श्यामा के पैसे मोहन की मां को नहीं देने चाहियें। कभी नहीं। मोहन ने बड़ा धोखा किया था मेरे साथ।
लेकिन एक मुश्किल थी। इतने पैसे मैं कहां छिपाकर रखूं। ऐसा करना मुश्किल था। मेरी हर चीज तो नानी की नजर में रहती थी। वह हर दिन मेरा बस्ता खोलकर देखती थीं। न जाने क्या खोजा करती थीं नानी। बस्ते के अलावा तो पैसे रखने की कोई और जगह नहीं थी मेरे पास। तब क्या किया जाए। मैं जितना सोचता उलझता जाता।
तभी नानी ने पीछे से आवाज दी-‘‘अरे, गली में खड़ा क्या कर रहा है। चल अंदर।’’ अब मुझे अंदर जाना ही था। मैं दहलीज में घुसा तो मन में आया-एक काम क्यों न करूं। ये पैसे नानी की गुप्त गुल्लक में क्यों न रख दूं। हां, यही ठीक रहेगा। हो सकता है, अब तक उन्होंने अपनी गुल्लक न देखी हो। क्योंकि भगवान के नाम पर रखे गए रुपए वह कभी खर्च तो करती नहीं थीं। लेकिन उस दिन उन्होंने मोहन और उसकी मां के जाने के बाद यह भी नहीं पूछा था कि मैंने मोहन को रुपए कहां से लाकर दिए थे। आखिर क्यों नहीं पूछी थी यह बात।
और मैंने फैसला कर लिया। श्यामा के दिए हुए रुपए मैं नानी की गुप्त गुल्लक में रखने जा रहा था। मुझे लग रहा था, इससे भगवान के पैसों की चोरी का कुछ बोझ तो कम होगा मेरे सिर से। हालांकि चोरी मैंने बुरे काम के लिए नहीं की थी। मैं सचमुच मोहन की मदद करना चाहता था, लेकिन...और मुझे मोहन पर फिर से गुस्सा आने लगा।

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मैं आंगन में पहुंचा तो नानी चारपाई बिछाकर लेटी थीं। वह थकी हुई लग रही थीं। मैं उनके पास जा बैठा और धीरे-धीरे उनका माथा सहलाने लगा। नानी ने आंखें मूंद लीं। शायद उन्हें कुछ आराम मिला था। वह शायद सो गई थीं। मैं कुछ देर अपनी जगह पर बैठा रहा। घर में और कोई नहीं था। फिर मैं धीरे से उठा, नानी पर नजर डाली और अंदर वाले कोठे की ओर बढ़ गया। वहीं जहां भगवान जी की तस्वीर के पीछे नानी की गुप्त गुल्लक थी। वैसे डरने की कोई बात नहीं थी, आखिर मैं कोई चोरी तो कर नहीं रहा था।
कोठे में अंधेरा सा था। बत्ती न होने के कारण अंदर के कोठे में दिन के समय भी हल्का अंधेरा-सा रहता था, पर मुझे कोई दिक्कत नहीं हुई। मैंने तस्वीर के पीछे गुप्त गुल्लक के कपाट खिसकाए, हल्की-सी आवाज हुई। मैंने जेब में हाथ डालकर श्यामा के दिए रुपए निकाल लिए। मन में था कि देखूं कितने हैं, पर इसका मौका नहीं था। वैसे मोहन को रुपए देते समय भी मैंने कहां गिने थे।
तभी मेरे पीछे आहट हुई-देखा दरवाजा पकड़े नानी खड़ी थीं-घबराहट में नोट मेरे हाथ से छूटकर जमीन पर गिर गए। ‘‘मैं...तो...’’ मैं बस इतना ही कह सका।
‘‘क्या मैं तो...मैं तो कर रहा है अभागे। अब कुछ नहीं है उस गुल्लक में। तू भगवान के घर में चोरी करते हुए भी नहीं हिचकिचाया! कैसा हो गया है रे तू! क्यों चाहिएं पैसे!’’ फिर उन्होंने झुककर जमीन पर गिरे नोट उठा लिए। ‘‘ये कहां से चुराकर लाया है? बोल जल्दी बोल।’’ नानी गुस्से में बोल रही थीं।
‘‘मैंने चोरी नहीं की। नानी, सच तुम्हारी कसम। मैं तो ये रुपए गुल्लक में रखने आया था।’’ मैं ठीक से बोल नहीं पा रहा था।
‘‘बता रुपए किसके हैं, कहां से लाया है?’’
मैं चाहता था श्यामा वाली बात नानी को न बतानी पड़े तो ठीक-पर नानी ने मुझे इस तरह घेर लिया था कि अब बिना बताए कोई चारा नहीं था। आखिर मैंने उन्हें बता ही दिया कि ये रुपए श्यामा ने मोहन की मां को देने के लिए मुझे दिए थे। श्यामा कौन थी, यह भी जितना मैं जानता था, कहना पड़ा।
‘‘सच कह रहा है या अब भी कुछ छिपा रहा है?’’
‘‘नानी, भगवान कसम...जरा भी झूठ नहीं है चाहो तो श्यामा से जाकर पूछ लो। देख लो उस आदमी को।’’
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‘‘धत्, मैं क्यों जाने लगी श्यामा के पास! अगर तू सच कह रहा है तो जाकर मोहन की मां को दे आ ये रुपए। और हां, यह तो बता जब रुपए किसी और के हैं तो भगवान की गुल्लक में क्यों रखने जा रहा था।’’
‘‘मैं कभी नहीं दूंगा उन लोगों को ये रुपए।। क्यों दूं, किसलिए? मोहन ने कितना बड़ा धोखा किया था मेरे साथ। मैं कभी नहीं जाऊंगा उसके पास।’’ मैं गुस्से से फट रहा था।
नानी ने मेरा हाथ पकड़ लिया-जोर से। मुझे लगा बस अब उनका थप्पड़ गाल पर पड़ने वाला है। वह मुझे खींचती हुई आंगन में ले आईं। ‘‘फिर तो कह मोहन ने धोखा दिया है तुझे। कैसा धोखा?’’
‘‘उसने कहा था कि वह अपने चित्र व माडल कभी वापस नहीं लेगा। पर फिर...आखिर उसके चित्र व माडल मैंने उससे छीने तो नहीं थे, उसने खुद दिए थे।’’
‘‘उसने मदद मांगी और तूने सौदा कर लिया। वाह रे!’’ चश्मे के पीछे से नानी की बड़ी-बड़ी आंखें मुझे घूर रही थीं उन्होंने अभी तक मेरा हाथ छोड़ा नहीं था।
‘‘तुझे ये रुपए लेकर अभी मोहन की मां के पास जाना होगा।’’ नानी धीरे-धीरे बोल रही थीं।
‘‘नहीं।’’
नानी ने झटके से मेरा हाथ छोड़ दिया। कुछ देर सिर नीचा किए बैठी रहीं, फिर बोलीं-‘‘ठीक है तो मैं चली जाऊंगी अभी...’’
‘‘तुम जाओगी-शाम हो रही है। अंधेरा...’’
‘‘अंधेरा मुझे खा नहीं जाएगा। जब तू मेरा कहा नहीं मानेगा तो अंधेरा क्या, उजाला क्या।’’ कहकर नानी रुपए गिनने लगीं। फिर आंचल की खूंट में बांधकर वह बाहर की तरफ चल दीं।
मैंने आज तक उन्हें शाम के समय यों अकेली घर से बाहर जाते हुए नहीं देखा था। इसका मतलब था, वह सचमुच गुस्से में थीं। पर उन्हें कैसे रोकूं। इस समय तो पड़नानी भी दिखाई नहीं पड़ रही थीं। मैं समझ गया था, नानी जो कहती हैं, उस पर टिकी रहती हैं। लायब्रेरी के मामले में उन्होंने लट्टू  चौधरी को कैसा सबक सिखाया था।
मैं जानता था, अगर मैं साथ न गया तो नानी अकेली ही मोहन की मां से मिलने चली जाएंगी। अगर मैं उन्हें रोक नहीं पा रहा था, तो कम से कम उनके साथ तो जा ही सकता था।

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नानी दहलीज पार कर चुकी थीं। मैं पीछे-पीछे दौड़ा। जाकर उनका हाथ पकड़ लिया। ‘‘नानी, मैं भी चलता हूं।’’ मैंने कहा।
नानी कुछ बोली नहीं, पर अपना हाथ छुड़ाया भी नहीं। यानी मैं चाहूं तो उनके साथ जा सकता था।
‘‘हम कल भी जा सकते हैं।’’ मैंने उन्हें रोकने की आखिरी कोशिश की। मैं सोच रहा था, इस समय नानी न जाएं तो फिर बात आई-गई हो जाएगी। लेकिन नानी न रुकीं। उन्होंने मुझसे धर्मशाला का पता पूछ लिया था। बाजार में निकलकर हम रिक्शा में जा बैठे। नानी ने कसकर मेरा हाथ पकड़ रखा था जैसे छोड़ते ही मैं उछलकर भाग जाऊंगा।
जैसे-जैसे हम सुनारों वाली धर्मशाला के पास पहुंच रहे थे, मेरा मन बैठा जा रहा था। मैं मोहन से कैसे बात करूंगा। कहीं ऐसा न हो उसे देखते ही मैं उससे भिड़ जाऊं। तब तो बहुत बुरा होगा। लेकिन भाग जाने की कोई राह नहीं सूझ रही थी मुझे।
रिक्शा धर्मशाला के बाहर जाकर रुक गया। धर्मशाला के पास बने मंदिर में आरती हो रही थी। काफी भीड़ थी। नानी ने भगवान को हाथ जोड़े फिर वहीं खड़े एक आदमी से कुछ पूछने लगीं। उसने धर्मशाला के पीछे की तरफ इशारा कर दिया। धर्मशाला का पिछला हिस्सा जैसे एकदम अलग था। बाहर रोशनी थी तो वहां अंधेरा। नानी ने किसी से पूछा तो उसने कहा-‘‘हां, कुछ दिन से एक बीमार औरत एक कोठरी में थी तो सही, पर अब कुछ पता नहीं।’’
नानी आगे बढ़कर कोठरी के पास जा खड़ी हुईं। अंदर दो जने बैठे थे, पर मोहन की मां और मोहन मुझे कहीं न दिखाई दिए। वे कहीं चले गए हैं-यह सोचकर मुझे चैन मिला। अच्छा है मोहन से सामना नहीं करना पड़ा था। अब हम घर लौट सकते थे-पर नानी धर्मशाला के अंदर जाकर फिर से पूछने लगीं। पता लगा मोहन और उसकी मां एक घंटा पहले यहां से चले गए। वे स्टेशन गए थे। जहां से वे कहीं जाने के लिए गाड़ी पकड़ने वाले थे।
‘‘कहां की गाड़ी?’’ नानी ने बताने वाले से पूछा था, पर उसे कुछ पता नहीं था।
मुझे याद आया, मोहन ने एक बार अपने किसी मामाजी का नाम लिया था, जो कहीं मधुपुर में रहते थे। कहीं वे मधुपुर तो नहीं चले गए? मैंने डरते-डरते नानी की ओर देखा-कहीं इन्हें पता तो नहीं कि मुझे मोहन ने यह बात बताई थी। पर यह मेरा वहम था। भला नानी को यह बात कैसे पता हो सकती थी। एक बार मन में आया कि मधुपुर वाली बात नानी को बता दूं पर फिर मैं चुप रह गया।
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मैंने नानी को कहते सुना, ‘‘पता चल जाता कि उन्हें कहां की गाड़ी पकड़नी थी तो मैं तेरे साथ स्टेशन जाकर मोहन की मां को ढूंढ लेती। उन लोगों को सचमुच पैसों की जरूरत होगी लेकिन...ऐसे तो स्टेशन जाकर भटकने से कोई फायदा नहीं।’’
मैंने कहा, ‘‘हां।’’ मेरे मुंह से मधुपुर का नाम निकलते-निकलते रह गया। अगर निकल जाता तो फिर आफत ही आ जाती मेरी।
नानी कुछ देर उदास-उदास धर्मशाला के बाहर खड़ी कुछ सोचती रहीं, फिर हम वापस लौट चले। घर आते-आते काफी अंधेरा हो गया था। गली में दुकानों पर शोर था। मकानों के आगे चबूतरों पर लोग बैठे बातें कर रहे थे। मुझे स्कूल के साथी घनश्याम और रमेश दिखाई दिए। पर मैंने जैसे उन्हें देखकर भी नहीं देखा। हो सकता था वे नानी के सामने स्कूल के बारे में कुछ ऐसा कह देते जो मुझे मुश्किल में डाल सकता था। तब मेरे लिए नानी के सवाल झेलने कठिन हो जाते।
दहलीज में मिट्टी के तेल की ढिबरी जल रही थी। थोड़े से हिस्से को छोड़कर लंबी दहलीज का बाकी हिस्सा अंधेरे में था। मैं नानी के पीछे था। एकाएक न जाने क्या हुआ, नानी लड़खड़ाईं और मुंह के बल गिर पड़ीं।
‘‘नानी!’’ मेरे मुंह से जोर की चीख निकल गई। तभी किवाड़ खुले और हल्की रोशनी दहलीज में फैल गई। ‘‘क्या हुआ?’’ कहती हुई पड़नानी वहां आ गईं। नानी को यों पड़ी देखकर पड़नानी जोर से रो पड़ीं। मैंने और उन्होंने मिलकर नानी को खड़ा कर दिया। उनके मुंह से खून निकल रहा था, पर वह होश में थीं। उन्होंने मेरा हाथ पकड़ लिया शायद सहारे के लिए। मैं उनसे लिपट गया। हम उन्हें अंदर ले गए।
पड़नानी ने झट मुझे द्वारिका डाक्टर को बुलाने भेज दिया। मैं उल्टे पैरों दौड़ गया। यह सब मेरे कारण हुआ था। अगर मैं जाकर मोहन की मां को पैसे दे आता तो नानी को यों न जाना पड़ता और गिरकर चोट न खातीं।
द्वारिका डाक्टर औधड़ वाली गली के किनारे पर बने मकान में रहते थे। वहीं उनका दवाखाना भी था। नानी को चोट लगने की बात सुनकर वह झट मेरे साथ चले आए। मैंने उनका बैग पकड़ रखा था। उनके बाल एकदम सफेद थे, देखने में एकदम बूढ़े लगते थे। वह नानी को बहुत अच्छी तरह जानते थे, मुझे भी वही दवाई दिया करते थे।

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उन्होंने नानी को देखा-होंठ कटकर सूज गया था। उन्होंने घाव साफ करके दवा लगा दी। पड़नानी से बोले-‘‘घबराने की कोई बात नहीं। चोट मामूली है। तुम देवन को मेरे साथ भेज दो, मैं खाने की दवा भिजवा दूंगा।’’
मैं उनके साथ उनके दवाखाने पर चला गया। वहां मेज पर एक बड़ा लैम्प जल रहा था। बाहर बैंच पर कई लोग बैठे थे। शायद वे भी दवा लेने आए थे। डाक्टर साहब मुझे अंदर ले गए। वहां दीवार के साथ कई अल्मारियां लगी थीं। उनमें छोटी-बड़ी शीशियां और कुछ बंद डिब्बे नजर आ रहे थे।
डाक्टर कुर्सी पर बैठ गए। मुझे लगा वह बिना बात देर कर रहे हैं। मुझे दवा लेकर तुरंत घर जाना चाहिए। पता नहीं नानी की तबीयत कैसी होगी। मुझे मन ही मन उन पर गुस्सा आने लगा। द्वारिका डाक्टर ने जैसे मेरे मन की बात पढ़ ली। हंसकर बोले-‘‘तू बहुत घबरा रहा है। चोट मामूली है, चिंता की कोई बात नहीं। मैं अभी देवा देता हूं। फिर झुककर बोले-‘‘देवन, जानता है न तेरे पिता डाक्टर थे। मैं और आगरे वाले मुरारीलाल विद्या यानी तेरी मां के रिश्ते की बात करने रामपुर गए थे। उसके बाद दोबारा जब रामपुर जाना हुआ...’’ वह बोलते-बोलते रुक गए और उठकर दवा बनाने लगे। ‘‘तू डाक्टर बनेगा न?’’
दवा की पुडि़या मुझे देकर उन्होंने बता दिया कि दवा कैसे खानी है। पर मैं जैसे सुन नहीं रहा था। लगा जैसे मैं रामपुर पहुंच गया हूं। और एक दवाखाने के बाहर खड़ा हूं। सामने डाक्टर का बोर्ड लगा है। उस पर लिखा है डाक्टर रघुवीर शरण। हां, नानी ने बताया था मेरे पिता का नाम। सामने कुर्सी पर कोई बैठा था। अंदर-बाहर मरीज बैठे थे। सब कह रहे थे-हमें ठीक कर दीजिए। हमने सुना है आप अच्छे डाक्टर हैं। मरीजों ने डाक्टर को घेर रखा था। इसीलिए कुर्सी पर बैठे डाक्टर पिता मुझे दिखाई नहीं दे रहे थे। मैं सोच रहा था-अगर लोग हट जाएं तो मैं उन्हें देख सकता हूं। मैंने लोगों के बीच जाकर डाक्टर पिता को देखना चाहा, पर उनका चेहरा मुझे साफ-साफ नजर नहीं आ रहा था। क्यों नहीं देख पा रहा था मैं उन्हें? पर वही थे-मेरे डाक्टर पिता। अपने डाक्टर पिता का चेहरा मुझे नजर नहीं आ रहा था, पर मां, मां का चेहरा तो जैसे चमक रहा था उस अंधेरे में।

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एकाएक कानों में आवाज आई, ‘‘देवन, अरे देवन, जाता क्यों नहीं। वहां चुप-चुप क्यों खड़ा है।’’ मुझे जैसे चेत हुआ। अरे मैं तो द्वारिका डाक्टर के दवाखाने में खड़ा था। उन्होंने दवा की पुडि़या मुझे दे दी थी। अब मुझे तुरंत घर जाकर नानी को दवा देनी चाहिए थी। मैं तुरंत दवाखाने से निकलकर घर की तरफ चल दिया। लेकिन वही दृश्य बार-बार आंखों के सामने घूम रहा था-रामपुर वाले दवाखाने में बैठे मेरे डाक्टर पिता और उनकी कुर्सी के पीछे खड़ी मुस्कराती, इशारे से मुझे अपने पास बुलाती मां। लेकिन मां तो...।
तभी कमर पर धक्का लगा। फिर आवाज सुनी, ‘‘देवन, अरे सुन तो, कहां भागा जा रहा है।’’ देखा स्कूल के साथी घनश्याम और रमेश खड़े हंस रहे हैं। वे पास वाली गली में रहते थे, पर इस वक्त...
‘‘बता तू क्या बनेगा?’’ घनश्याम ने पूछा।
‘‘क्या बनूंगा।’’ बात मेरी समझ में नहीं आई थी। ‘‘हां, जल्दी बता हनुमान का वानर या रावण का राक्षस। भई, हम दोनों तो राक्षस बनेंगे। हमने सोच लिया है। तू अपनी बता।’’
मैं अब भी कुछ नहीं समझा था। हाथ की पुडि़या मुझे बता रही थी, मुझे तुरंत नानी के पास पहुंचना चाहिए। ‘‘तुझे पता नहीं, जल्दी ही गली में नाटक खेला जाएगा। वही मंडली जो हर साल आकर गली में नाटक करती है। मैंने आज मंडली वाले को गली में बातें करते देखा था। पिछले साल भी तो वह आया था मंडली के साथ। मैं तो झट पहचान गया उसे। देखना खूब मजे आएंगे।’’
मैंने कहा-‘‘नानी को चोट लगी है, उनके लिए दवा लेकर जा रहा हूं। अभी नहीं रुक सकता।’’ और मैं मोड़ घूमकर घर की तरफ बढ़ चला। हमारी गली जहां से चौराहे की तरफ मुड़ती थी, वहां की चौड़ी जगह पर मंच बनाकर मंडली वाले नाटक खेलते थे। उनका सारा इंतजाम हरना बाबा किया करते थे। लेकिन इस बार...
मैं दहलीज पार करके आंगन में जा खड़ा हुआ। देखा नानी चारपाई पर बैठी बातें कर रही हैं। यह देखकर मेरी घबराहट कुछ कम हो गई। द्वारिका डाक्टर ने भी तो यही कहा था कि घबराने की कोई बात नहीं है। मैंने नानी को दवा दी और कह दिया-‘‘डाक्टर ने कहा है कि तुम्हें हिलना-डुलना नहीं है। तुम बस लेटी रहो।’’
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नानी मुस्कराईं।" तूने अपने हाथ से मुझे दवाई दे दी तो मैं जी गई। अब मुझे कुछ नहीं होगा। मैं तेरी शादी देखकर मरूंगी।’’ उनकी बात सुनकर पड़नानी भी हंस पड़ीं। पर मुझे हंसी नहीं आई। मान लो गिरने से नानी को ज्यादा चोट आ जाती तो? मुझे रोना आ गया। नानी ने हाथ बढ़ाकर मुझे गोदी में भर लिया और धीरे-धीरे मेरे माथे पर हाथ फेरने लगीं। उनके इस तरह प्यार करने से मुझे सुजानी की याद आ गई, पर वह तो कई महीनों से अपने गांव गई हुई थीं। उनके भाई बहुत बीमार थे। उन्होंने सुजानी भाभी को बुलाया था। न जाने वह कब लौटकर आएंगी।
पड़नानी सो गईं, ऊपर बारुमल भी बरफ बेचकर आ चुके थे। उनके हुक्के की गुड़गुड़ सुनाई दे रही थी। खाना खाने के बाद वह हुक्का जरूर पीते थे। क्या वह भी कभी मिले थे मेरे पिता से द्वारिका डाक्टर की तरह। शायद हां, शायद नहीं। अगर कभी मैं उनसे रामपुर के बारे में पूछूं तो क्या वह मुझे कुछ बताएंगे। उनसे मैंने न जाने कितनी कहानियां सुनी थीं, पर मां या पिताजी के बारे में उन्होंने कभी कुछ नहीं कहा था।
मैं नानी के पास ही लेट गया। उनका एक हाथ मेरे सिर पर था, उनकी उंगलियां धीरे-धीरे मेरा माथा थपक रही थीं बिल्कुल सुजानी भाभी की तरह। नानी थोड़ी देर में सो गईं। आंगन में जलती लालटेन बुझने को हो रही थी। उसका तेल खत्म होने जा रहा था। शायद नानी को आज लालटेन की चिमनी साफ करके उसमें तेल भरने का मौका नहीं मिला था। मिलता भी कैसे, वह तो मेरे साथ मोहन की मां को ढूंढ़ रही थीं।
कहां होंगे मोहन और उसकी मां? शायद मोहन को उसकी मां मधुपुर अपने भाई के घर ले गई हों। क्या उनके पास टिकट और दवाई के लिए पैसे होंगे? हो सकता है न हों। अब मुझे पछतावा हो रहा था। यह तो गलत हुआ। मुझे श्यामा के दिए पैसे मोहन की मां के पास जरूर पहुंचाने चाहिएं थे। कम से कम नानी को तो मधुपुर वाली बात मैं बता ही सकता था। तब वह स्टेशन जाकर मोहन की मां से मिलकर उन्हें रुपए दे सकती थीं, उनका हाल-चाल पूछ सकती थीं। हो सकता है तब दहलीज में यों ठोकर खाकर न गिरतीं।
घर में सब सो रहे थे, पर मुझे नींद नहीं आ रही थी। रह-रहकर रामपुर में डाक्टर पिता और मां दिखाई दे रहे थे। बार-बार कोशिश करके भी मैं पिता का चेहरा साफ-साफ नहीं देख पा रहा था। ऐसा क्यों था? और फिर जमीन पर लेटी खांसती मोहन की मां और उनके पास उदास बैठा मोहन नजर आने लगते।
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यह क्या कर डाला था मैंने। मैं झटके से उठा तो नानी भी उठ बैठीं-बोलीं-‘‘क्या बात है, तबीयत तो ठीक है? मैं लेटी-लेटी देख रही थी तू जाग रहा है। बता न मुझे।’’
मैंने उन्हें बता दिया कि क्या बात मुझे परेशान कर रही थी। ‘‘नानी, मैं जानता था, वे दोनों मधुपुर जाएंगे पर मैंने तुम्हें नहीं बताया। मैं मोहन पर गुस्सा था। पर...’’ मेरी आंखों में आंसू उमड़े आ रहे थे।
नानी ने मेरी कौली भर ली। मेरा माथा चूमने लगीं। ‘‘सचमुच बुरा हुआ। तू बता देता तो हम स्टेशन जाकर मोहन और उसकी मां से मिल सकते थे। पर अब क्या फायदा। कल जाकर श्यामा को उसके पैसे लौटा आना।’’
मैं चुप रहा। मेरे मुंह से निकल गया, ‘‘नानी। द्वारिका डाक्टर...’’
‘‘हां, क्या कहा उन्होंने।’’
मैंने नानी को बता दिया जो उन्होंने कहा था। नानी फूट-फूटकर रोने लगीं, मैं उनके आंसू पोछने लगा। ‘‘हां, मुरारी भाई के साथ द्वारिका डाक्टर भी रामपुर गये थे लड़का देखने। लौटकर उन्होंने तारीफ की थी। कहा था, मैं सब देख आया। लड़का अच्छा डाक्टर है। तुम्हारी बेटी सुख से रहेगी। लेकिन हमारे फूटे भाग्य। तेरी मां ओफ...बाद में मुरारी भाई और द्वारिका डाक्टर ही तुझे और तेरी मां को रामपुर से दिल्ली लेकर आए थे। विद्या को देखकर मेरा कलेजा फट गया था। अपने दिन भी याद आ गए थे। भगवान भी कैसा है। जो एक बार मेरे साथ हुआ था, वही मेरी बेटी के साथ हो गया था।’’
मैं नानी को चुप कराता रहा, पर वह रोती ही रहीं। पड़नानी भी आकर उन्हें समझाने लगी थीं।
फिर न जाने मुझे कब नींद आ गई।
सुबह उठकर लायब्रेरी के लिए बाहर जाने लगा तो बोलीं, ‘‘उठ गया। जा हाथ मुंह धोकर कुछ खा ले। अखबार रखने के बाद श्यामा के पैसे दे आना।’’

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ओह तो नानी कुछ भी नहीं भूली थीं। मैं तो समझा था, चोट लगने के बाद सब बदल जाएगा, लेकिन नानी तो अब भी वहीं खड़ी थीं जैसे। मैंने देखा उनके होंठ की सूजन कम हो गई थी। मैं समझ चुका था, मुझे श्यामा के पास जाना ही होगा। शास्त्री जी से अखबार लेकर चबूतरे पर डालने के बाद मैंने नानी से रुपए लिए और ऊपर वाली मुंडेर फांदकर मोहन की छत पर जा पहुंचा। नजरें जैसे आपसे आप कोने में जा टिकीं। सब सुनसान था। जहां कभी मोहन नगर स्टेशन हुआ करता था, वहां बस फटे हुए कागज बिखरे थे। आखिर मोहन अपने बनाए माडल कहां ले गया होगा? बीमार मां के साथ दर-दर भटकते हुए तीलियों से बने बड़े-बड़े माडलों को साथ रखना क्या संभव हो सका होगा। मुझे लग रहा था, नानी से अपने कुतुबमीनार, जंतर-मंतर और बिरला मंदिर के माडल वापस ले जाने के बाद जरूर उन सबको बेच दिया होगा मोहन ने।
मैंने छत के कोने में खड़े होकर नीचे झांका तो श्यामा के घर का दरवाजा थोड़ा सा खुला दिखाई दिया, पर फिर उस आदमी के शब्द कानों में गूंजने लगे-‘‘आज के बाद मोहन को पूछने यहां मत आना।’’ अगर वह कमरे में हुआ और उसने मुझे उल्टा-सीधा कहा तो क्या होगा , सीढि़यों से नीचे उतरते हुए मैं यही सोच रहा था। मन कर रहा था, श्यामा के पास न जाना पड़े तो ठीक, लेकिन...मैं खूब जानता था, मुझे जाकर श्यामा को उसके रुपए लौटाने ही थे।
मैं दरवाजे के सामने जा खड़ा हुआ। अरे, अंदर से किसी औरत के रोने की आवाज आ रही थी। कोई जोर-जोर से रो रही थी। क्या वह श्यामा थी? पर रो क्यों रही है! उस दिन तो वह हंस-हंसकर बातें कर रही थी। मैं सोच रहा था, रोने की आवाज बंद हो तो दरवाजा खटखटाऊं। पर रोने की आवाज आती रही। आखिर मैं कब तक इस तरह वहां खड़ा रह सकता था। हिम्मत करके मैंने धीरे से दरवाजा खटखटा दिया। रोने की आवाज बंद हो गई। कुछ पल खामोशी रही, फिर झटके से दरवाजा खुल गया। मैंने देखा वह श्यामा थी। उसके पीछे कमरे में सामान इधर-उधर बिखरा दिखाई दे रहा था।
‘‘क्या है? कौन है?’’ उसने तेज आवाज में पूछा। उसकी आंखें लाल थीं। वह आंखें पोंछ रही थी।
‘‘मैं देवन...आपने मुझे रुपए दिए थे...’’
‘‘तो फिर...’’ उसने टोक दिया। जैसे वह मुझे पहचान नहीं रही थी।
मैंने नोट निकालकर उसकी तरफ बढ़ाए। ‘‘मैं मोहन की मां को रुपए देने गया था, पर वे लोग नहीं मिले। लीजिए।’’ मैंने हाथ बढ़ाया। श्यामा ने नोट जैसे मेरे हाथ से झपट लिए। चिल्लाई, ‘‘भाड़ में जाएं सब। जाओ  भागो।’’ और नोट बाहर फेंककर दरवाजा बंद कर लिया।(आगे और है)

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