शुक्रवार, 4 मार्च 2016

आत्म कथा - चार



अपने साथ
       -देवेन्द्र कुमार
आत्म कथा - चार
तीसरी क़िस्त – पृष्ठ 29 से 41 तक_ अब आगे पढ़ें
मैंने नानी को राघव के पास माँ का फोटो होने की बात बताई ,जो कुछ उनसे सुना था,वह भी कहा.नानी रोते-रोते बेहोश हो गईं. मैं  डर गया.इसके बाद मैंने कुछ नहीं पूछा.बाद में पता चला कि राघव दूसरे शहर में चले गए थे. फिर मुझे भाभी के साथ आगरा जाना पड़ा. वहां बाबूजी के पास जुबैदा को देखा. वह मुझे अपने घर ले गई.फिर उसका कुछ पता न चला.एक लडकी जूही मिली जो बीमार थी.घर में कई सजी-धजी लडकियां थीं. गाना-बजाना हो रहा था पर जूही की तरफ किसी का ध्यान नहीं था . जूही मुझे अपने जैसी लगी.जुबैदा बीमार जूही को छोड़कर कहाँ चली गई थी?और फिर मेरे और जूही के बीच कुछ ऐसा हुआ...

रात घिर चुकी थी, न बाबूजी घर में थे, न राधे भाई। मुझे देखते ही कलावती लपक कर पास आईं, पर सुजानी दूर ही खड़ी रहीं। कलावती ने एक बार में ही बहुत से सवाल पूछ डाले-‘‘उसका घर कैसा है? वहां और कौन-कौन है? क्या होता है? क्या बाबूजी भी थे वहां?’’
‘‘वहां बाबूजी नहीं थे, और कुछ मत पूछो। बहुत खराब लोग हैं...। सबशब्द मेरे मुंह से निकलते-निकलते रह गया। सब में तो फिर जूही भी आ जाती न। यह ठीक है उसने मुझे थप्पड़ मारा था, पर झट से माफी भी तो मांग ली थी। नहीं, नहीं मेरा मन उसे खराब कहने को तैयार नहीं था।
‘‘खराब तो होंगे ही। वरना क्या यह हाल होता।’’ कलावती ने कहा और सुजानी की तरफ देखने लगीं। सुजानी परदे का छोर पकड़े हुए चुप खड़ी थीं, उन्होंने साड़ी के पल्लू से मुंह ढंक रखा था, जैसे अपना मुंह न दिखाना चाहती हों।
कलावती लगातार बोले जा रही थी-वह क्या कह रही हैं यह मेरी समझ में नहीं आ रहा था। बोलते-बोलते रुक कर उन्होंने मुझे हाथ पकड़कर पास में बैठा लिया, फिर बोलीं-‘‘जानता है, जब मैं दिल्ली आई थी तो तेरे बाबूजी ऐसे न थे। पर अब तो...’’
42

और वह आंचल से आंखें पोंछने लगी। क्या यह वही कलावती थीं जो सुबह-सुबह डांटकर भगा दिया करती थीं। और जब पड़नानी दोबारा भेजती थीं तो थोड़े से पैसे अंदर से लाकर दे दिया करती थीं-ऐसे जैसे फेंक रही हो। तब मुझे बहुत बुरा लगता था, लेकिन पड़नानी का भेजा हुआ, मैं जाता ही था।
कलावती कहे जा रही थीं-‘‘मैं अपने घर में कितने आराम से थी, लेकिन तेरे बाबूजी के कहने में आकर दिल्ली चली आई। और अब यह मुझसे बात भी नहीं करते। हर रोज जुबैदा के घर जाते हैं।’’ यह कहते हुए वह सुजानी की तरफ देख रही थीं, जो लगता था कि खड़े-खड़े ही सो गई थीं-ऐसे चुप खड़ी थीं। मेरा मन था, वह बैठें तो मैं उनकी गोद में सिर रखकर लेट जाऊं और फिर वह चाहे कुछ भी न पूछें, उन्हें जूही के बारे में सब कुछ बता दूं। हां, कलावती को मैं कुछ भी बताने वाला नहीं था। लेकिन आज कलावती को हुआ क्या था जो इस तरह मुझसे बातें किए जा रही थीं।
मैंने उन्हें और सुजानी को कभी आपस में ज्यादा बातें करते  नहीं सुना था। दिन में वे अलग-अलग कमरों में होती थीं और जब बाबूजी घर में होते थे उनके पास कलावती बैठती थीं। यहां आगरे में भी मैंने भाभी को कलावती की तरह बाबूजी के पास जाकर बात करते हुए कभी नहीं देखा था।
‘‘मुझे ही कुछ करना होगा, यह कुछ नहीं करेगी।’’ यह बात उन्होंने सुजानी की तरफ देखकर कही थी। तभी सुजानी ने संकेत किया और परदा छोड़कर अंदर चली गईं। मैं जैसे उछलकर उनके पीछे-पीछे भागा। कलावती पुकारती रह गईं-‘‘अरे सुन तो...सुन तो..
सुजानी पलंग पर बैठ गई थीं। मैं झट उनकी गोद में सिर रखकर लेट गया। उन्होंने बाल सहला दिए, तभी मेरे माथे पर कुछ गीला-गीला लगा। अरे, वह चुप-चुप रो रही थीं। लेकिन वह रोना जूही की तरह नहीं था। सबसे अलग था। मैंने कहा-‘‘भाभी, बताओ न क्या बात है? मैं औरों की तरह उन्हें भाभी कहता था, हालांकि वह मुझसे बहुत बड़ी थीं और किसी तरह मेरी भाभी नहीं हो सकती थीं। वह मेरे बाल सहलाती रहीं और मैं उन्हें जूही के बारे में बताता चला गया। सब कुछ ही तो बता दिया उन्हें मैंने पर अचरज की बात थी कि भाभी ने एक भी शब्द नहीं कहा। न जाने क्यों।
बाहर वाले कमरे में कलावती चीजों को पटक रही थीं। उन्हें शायद जोरों का गुस्सा आ रहा था। पर यह गुस्सा मुझे डरा नहीं रहा था। मैं उसी तरह सुजानी की गोद में लेटा रहा और वह मेरा सिर थपकती रहीं। फिर पता नहीं मुझे कब नींद आ गई।
                           43

सुबह मैं उठा तो अंधेरा सा था। बाबूजी बाहर के कमरे में बैठे थे। वहां उनके और कलावती के बोलने की आवाजें आ रही थीं। बाबूजी हंस रहे थे वह गुस्सा कर रही थीं। सुजानी रसोई में काम कर रही थीं और राधे भाई छज्जे में आधी चारपाई बाहर निकाले सो रहे थे। रोज ही तो ऐसा होता था। रात को बाबूजी के जाने के बाद राधे भाई भी न जाने कहां चले जाते थे और सुबह जब मेरी नींद खुलती थी तो दोनों घर में दिखाई देते थे। एक दिन मैंने भाभी से बाबूजी और राधे भाई के बारे में पूछा था तो वह मेरे गाल पर हल्की सी चपत लगाकर दूसरे कमरे में चली गई थीं।
हां, तो उस दिन सुबह से बारिश हो रही थी। कई बार बादल गरज उठे, फिर बिजली चली गई। दिन में ही जैसे रात हो गई। मैं सुजानी के पास रसोई में चला गया। वह अंगीठी के सामने बैठी कुछ कर रही थीं। अंगीठी के आंच में उनका मुंह लाल-लाल चमक रहा था। मुझे देखकर वह लाल मुंह से हंस पड़ीं। बोली-‘‘यहां अंधेरे में क्या कर रहा है, जा बाहर खेल।’’
‘‘कहां खेलूं? बाहर बारिश हो रही है।’’
‘‘क्या आज भी जाएगा वहां?’’ कहकर सुजानी ने मेरा कान पकड़कर हिलाया, जैसे कह रही हों  अगर कभी गया तो कान पकड़ूंगी।
मुझे मजा आया, मैंने कहा-‘‘अच्छा बताओ कभी तुमने बाबूजी का कान पकड़ा है? नहीं-नहीं, मेरा मतलब जब वे सो रहे हों।’’
‘‘शैतान कहीं का। ऐसा कब होता है जब बाबूजी सो रहे हों और घर में हों। और फिर मैं उनके कान पकड़ूंगी या पैर। क्यों रे पागल?’’
आज पहली बार मैंने सुजानी को बाबूजी के बारे में इस तरह बातें करते सुना था। वरना जब बाबूजी घर में होते थे तो वह दूर खड़ी रह कर उनकी ओर बस ताकती रहती थीं। मैं सोचा करता था  वह कलावती या जुबैदा की तरह बाबूजी से हंसकर बातें क्यों नहीं करतीं, क्या कोई मना करता है उन्हें?
दोपहर हो गई, पर पानी न थमा। मैंने देखा बाबूजी नए कपड़े पहन कर जैसे कहीं जाने को तैयार थे। वह बार-बार घड़ी देखते और जाकर छज्जे में खड़े हो जाते जैसे किसी की राह देख रहे हों।
44

तभी कलावती की आवाज सुनी, ‘‘आज यह बारिश रुकेगी नहीं। क्यों परेशान हो रहे हो? कपड़े बदलकर आराम से बैठो। मैं सुजानी से हलवा बनवाती हूं।’’
बाबूजी ने कोई जवाब नहीं दिया। बस एक बार पीछे घूमकर देखा। उनके चेहरे पर गुस्सा था, पर वह कुछ बोले नहीं। उसी तरह खड़े रहे। मैंने सुजानी की ओर देखा। वह रसोई में जाकर हलवा बनाने की तैयारी करने लगीं। मुझे गुस्सा आया। यह क्या बात हुई। क्या सुजानी कलावती की नौकरानी हैं जो उनके कहते ही हलवा बनाने लग गईं। कलावती कौन होती है उन पर हुक्म चलाने वाली। मैं झट अंदर गया और सुजानी से कढ़ाही छीन ली।
‘‘क्या बाबूजी ने कहा है, हलवा बनाने के लिए?’’
‘‘वह तो कभी कुछ कहते ही नहीं।’’ सुजानी ने कहा।
‘‘तो फिर मत बनाओ। जब बाबूजी कहें तब बनाना। तुम कलावती का हुक्म क्यों मानती हो?’’
पता नहीं, क्या हुआ, फिर सुजानी भी रसोई से बाहर आ गईं। आंगन में खूब पानी गिर रहा था। नाली रुकने से सब जगह पानी ही पानी भर गया। मैंने कागज लिया और नाव बना कर तैरा दी। मेरी नाव डगमग करती पानी पर चक्कर काटने लगी। सुजानी भी वहां आ गईं। मैंने कहा-‘‘तुम भी बनाओ न नाव।’’
‘‘क्या मैं तेरी नाव में नहीं बैठ सकती, जो दूसरी नाव बनाने को कह रहा है। तू दिल्ली से मेरे साथ आया था। अब क्या अलग जाएगा।’’ सुजानी ने कहा और हंसने लगीं।
‘‘मेरी नाव छोटी-सी है। तुम बड़ी नाव बनाओ। उसमें तुम बाबूजी के साथ बैठना, फिर यहां से चली जाना। कलावती और जुबैदा यहीं खड़ी रहेंगी और उन्हें कुछ पता नहीं चलेगा। जब उन्हें पता चलेगा तब तक तुम अपनी नाव में बाबूजी को लेकर दूर चली जाना। अगर वे देानों अपनी नाव बना कर तुम दोनों के पीछे आएंगी तो मैं उनकी नाव में छेद कर दूगा। डूब जाएगी उनकी नाव।’’
सुजानी ने मेरी कौली भर ली। मेरा हाथ चूमने लगीं, बाल सहलाने लगीं। मैंने देखा, वह रो रही थीं, पर हंस भी रही थीं। मुझे एकदम हरना बाबा की पत्नी की याद आ गई। उस दिन अखबारों वाली कोठरी में ऐसे ही रोते-हंसते हुए उन्होंने मुझे अपनी गोद में पकड़ लिया था। उस दिन मैं डर गया था, पर आज ऐसा कुछ नहीं था। मुझे अच्छा लग रहा था। बारिश तेज हो रही थी। मेरी नाव पानी पर चकफेरियां खा रही थी। फिर सुजानी भी एक तरफ बैठकर कागज की नाव बनाने लगीं। मैंने कहा-‘‘यह तो मेरे  जितनी ही है। बड़ी बनाओ न।’’
45

सुजानी ने बड़ा कागज लिया और बड़ी सी नाव बनाई और पानी पर तैरा दी। मैंने नाव में दो सिक्के रख दिए। कहा-‘‘एक तुम, एक बाबूजी। हो गए दो जने।’’
‘‘और तू कहां बैठेगा? मैं तेरे बिना नहीं रहूंगी। राधे और राज को भी ले चलना।’’ राधे से मतलब राधे भाई और राज उनसे छोटे जो लखीमपुर खीरी में अपनी बड़ी बहन कैलाशो के पास रहकर पढ़ते थे।
‘‘पूरा दिल्ली शहर ले चलोगी अपने साथ।’’
सुजानी ने कोई जवाब नहीं दिया। वह मुड़कर अंदर चली गईं, मैंने देखा इसी बीच कलावती वहां आ गई थीं और ध्यान से हमारी बातें सुन रही थीं.  मैं भी वहां से हटकर छज्जे में चला गया और बारिश देखने लगा। बाबूजी भी वहीं खड़े थे।
बारिश रुकी तो रात के दस बज गए थे। बत्ती भी आ गई थी। बाबूजी झटपट तैयार होने लगे। राधे भाई अंदर थे। अरे यह क्या! कलावती तो दरवाजे के पास खड़ी थीं। वह दरवाजे का कुंडा पकड़कर हिला रही थीं और देखते-देखते उन्होंने कुंडे में ताला लगा दिया। ऐसा तो आज तक कभी नहीं हुआ था। मैं समझ न पाया कि कलावती ने कुंडे में ताला क्यों लगाया है। ताला लगाने के बाद वह सुजानी के पास आईं। धीरे से बोलीं-‘‘मैं तो ऊपर सोने जा रही हूं।’’ फिर उन्होंने चाबी को तकिए के नीचे रखा और ऊपर चढ़ गईं।
मेरा दिल जोर-जोर से धड़कने लगा। अब झगड़ा होगा। और वही हुआ भी। बाबूजी ने टोपी  लगाई, छाता लिया और दरवाजे की ओर बढ़े फिर रुक गए। जोर से बोले-‘‘ताला किसने लगाया?’’
कोई नहीं बोला। कलावती ऊपर वाले कमरे में चली गई थीं। बत्ती बंद थी। क्या वह सो गई थीं। सुजानी परदे का छोर पकड़े खड़ी थीं. राधे भाई धीरे से बोले-‘‘पागल।’’
‘‘मैं मार डालूंगा उसे जिसने ताला लगाया है।’’ बाबूजी ने कहा।
‘‘मैने लगाया है। मारो मुझे।’’ कलावती की आवाज आई। उनके कमरे की बत्ती जल गई थी और वह खिड़की में खड़ी थीं. ‘‘ताला नहीं खुलेगा।’’
मुझे लगा कि अब बाबूजी ऊपर जाकर कलावती से मारपीट करेंगे, लेकिन वह चुपचाप ताला लगे दरवाजे के पास खड़े रहे। तभी मैंने देखा सुजानी ने तकिए के नीचे से ताली उठाई और ताला खोल दिया। सांकल खुली और बाबूजी झटपट नीचे उतर गए।
46

‘‘सुजानी, यह क्या किया तूने! मेरा लगाया ताला क्यों खोला?’’ कलावती जोर-जोर से बोल रही थीं पर सुजानी ने कोई जवाब नहीं दिया। वह पलंग पर चादर ओढ़कर लेट गईं, मैं भी उनकी चादर में दुबक गया। दरवाजा फिर खुला, इस बार राधे भाई सीढि़यों से उतर गए। सुजानी चुप लेटी थीं जैसे गहरी नींद में हों, पर उनका एक हाथ मेरा सिर थपक रहा था। वह सोई नहीं थीं, फिर न जाने कब मुझे नींद आ गई।
सुबह मेरी आंख खुली तो देखा बाबूजी बाहर वाले कमरे में जोर-जोर से बोल रहे थे-‘‘जाने दो, अभी आ जाएगी। जाएगी कहाँ। ठिकाना ही कौन-सा है।’’
  मैंने परदे के पीछे से देखा वह राधे भाई के साथ बातें कर रहे थे। समझ में नहीं आ रहा था कि मामला क्या है। तभी सुजानी वहां आ गईं। मेरे कान में बोलीं-‘‘कलावती पता नहीं कहां चली गई हैं। पूरा घर देख लिया। कहीं नहीं है। न जाने मुंह अंधेरे कहां चली गईं कलावती। और उन्होंने किसी से कुछ कहा भी नहीं था।’’
कलावती कहां गई पता नहीं चला। मुझे लगा बाबूजी उनसे नाराज थे इसलिए घर से चली गई, पर सुजानी ने बताया वह बाबूजी से नाराज होकर गई हैं। एक दिन राधे भाई और बाबूजी को उनके बारे में बातें करते सुना। कलावती अपने दिल्ली वाले घर में भी नहीं गई थीं। मालूम पड़ा बाबूजी ने राधे भाई को पता करने के लिए दिल्ली भेजा था। उन्होंने ही लौट कर खबर दी थी।
मैंने सोचा तब तो मैं भी दिल्ली जा सकता था। पता नहीं क्यों, अब रावतपाड़े वाले घर में मेरा मन नहीं लग रहा था। एक दिन मैंने सुजानी से कहा-‘‘हम दिल्ली कब चलेंगे?’’
‘‘क्यों क्या बात हैं अब क्यों परेशान है। वह तो गई।’’ सुजानी ने कहा, शायद वह कलावती के बारे में कह रही थीं। ठीक है कलावती गई, पर आगरे में जुबैदा तो थी। मैंने उसके बाद जुबैदा को कभी घर आते नहीं देखा, पता नहीं क्यों। मन में था एक बार जाकर जूही को देख आऊं, पर जाता कैसे, मुझे तो जुबैदा का घर भी मालूम नहीं था। मान लो मैं जूही से मिलने जाता और जुबैदा मिल जाती तो...सच तो यह था कि मैं जुबैदा की सूरत भी नहीं देखना चाहता था। बाप रे कैसी चालाक थी। बाबूजी से कैसी मीठी-मीठी बातें करती थी और अपने घर में बीमार जूही को कैसे अकेली छोड़कर न जाने किसके साथ
कहाँ  चली गई थी। सुजानी कितनी अच्छी और सुंदर थीं, फिर भी पता नहीं बाबूजी उनसे बात क्यों नहीं करते थे। उन जितना गोरा हमारे घर में और कोई नहीं था, बस होंठ ही जरा-सा टेढ़ा था। एक बार मैंने ऐसे ही पूछ लिया था तो उन्होंने धीरे से कहा था-‘‘मैं गांव से आई हूं न। पढ़ी-लिखी नहीं हूं। तेरे बाबूजी शहर के हैं। भला वह मुझे क्यों पसंद करने लगे।’’ अगर ऐसी बात थी तो फिर देानों की शादी कैसे हुई, यही बात मेरी समझ में नहीं आती थी।
47

आजकल राधे भाई दाढ़ी बढ़ा रहे थे। वह अचकन और चूड़ीदार पजामा पहनने लगे थे। हाथ में एक रूमाल रखते थे। वह मुझसे किसी दोस्त की तरह बातें करते थे। एक दिन मैंने उनसे कहा-‘‘आप दिल्ली कब जाएंगे?’’
‘‘दिल्ली में क्या है?’’
‘‘आप गए तो थे।’’
‘‘हां, गया था। बाबूजी के कहने पर गया था। पर तुझे दिल्ली जाने की क्या जल्दी है। अभी तो स्कूल की छुट्टियां हैं। आराम से चलेंगे।“
छुट्टियां! भला मैं उन्हें कैसे बताता कि मैं स्कूल जाता नहीं था। मेरी तो छुट्टियां ही रहती थीं। राधे भाई ने कहा-‘‘अच्छा ले एक काम कर।’’
‘‘क्या!’’
उन्होंने एक कागज दिया। फिर पैन थमाकर बोले, ‘‘इस पर जो जी चाहे लिख दे। कोई भी नाम।
‘‘कोई भी नाम क्यों?’’
‘‘जैसा कहता हूं वैसा कर।’’
‘‘कोई भी।’’
‘‘हां, हां कोई भी नाम। पर लिख तो सही।’’
मैं लिखने लगा-अरे, जो पहला नाम मेरे हाथ से लिखा गया वह मां का था-मैंने लिखा-विद्यावती, मुरारीलाल, राधे मोहन...
राधे भाई ने कागज देखा और हंसकर छीन लिया। बोले-‘‘तू भी बस यूंही। अरे ये नाम तो मैं भी जानता हूं। तू नाम लिख फूलों का।’’
फूलों की बात सुनते ही मैंने लिखा-जूही, चमेली, गेंदा, गुलाब, कचनार। और फिर जूही का चेहरा कागज पर दिखाई देने लगा। चारपाई पर लेटी जूही, खांसती जूही, जूही जूही ...
जूही...
एकाएक राधे भाई ने कहा-‘‘अरे ! सारे कागज पर जूही-जूही लिखे जा रहा है।’’ मैंने देखा तो कान गरम हो गये। सचमुच मैंने बाकी फूलों का नाम सिर्फ एक बार लिखा था, पर जूही लिख-लिखकर मैंने पूरा कागज ही भर डाला था।
राधे भाई ने कागज उठाया और देखने लगे। मेरी समझ में नहीं आया कि वह मुझसे फूलों के नाम क्यों लिखवा रहे थे। अगर वह न कहते तो मैं जूही का नाम कभी न लिखता। मन में आ रहा था अभी चला जाऊं और देखूं कि उसका बुखार कैसा है। उस जुबैदा को, जिसे पता नहीं क्यों जूही अपनी मां कहती थी, उसकी जरा-सी भी चिंता नहीं थी।
48

‘‘आप ये नाम क्यों लिखवा रहे हैं?’’ मैंने पूछा। राधे भाई भी एक कागज लेकर उस पर न जाने क्या-क्या लिखे जा रहे थे। क्या खेल था यह?
‘‘मुझे एक नाम चुनना है। इसलिए लिखवा रहा हूं। जानता है क्यों?’’
मैं चुप। भला मैं कैसे जान सकता था। ‘‘नहीं जानता, जानेगा भी कैसे। पूरे आगरे में कोई नहीं जानता। मैं पत्रिका निकालने जा रहा हूं। महीने में एक बार छपेगी पत्रिका।’’
मुझे ध्यान आया, आगरे वाले घर में दो अखबार आते थे, सैनिक और अमर उजाला। पर दिल्ली वाले घर में तो कोई अखबार नहीं आता था। बस, गली में हरना बाबा के चबूतरे पर अखबार डाले जाते थे। एक-दो पत्रिकाएं भी वहां पड़ी रहती थीं। भला राधे भाई को यह क्या सूझी।
राधे भाई बहुत देर तक नाम लिखते रहे फिर कागज समेट कर चले गए। दिन में कई बार आए-गए। जब भी आते साथ में कोई न कोई होता। वे बाहर वाले कमरे में बैठकर जोर-जोर से बातें करते। कागजों पर नाम लिखे जाते। एक-दो बार मैंने उन्हें जूहीका नाम लेते सुना। क्या वह जूही के पास होकर आए थे? मेरा मन हुआ उनसे पूछूं, पर फिर चुप रह गया। उनके साथ आने वाले नए लोग थे। वे पहले कभी हमारे घर नहीं आए थे। एक दिन तो सड़क पार मसाले वाला रामभरोसे भी आया। उसने राधे भाई से कहा-‘‘भैया, मैं भी कविता लिखता हूं। क्या वह भी छपेगी?’’
‘‘हां, छपेगी पर तुम्हें बदले में कुछ करना होगा।’’ राधे भाई ने हंस कर कहा।
‘‘क्या करना होगा भैया जी। खाने में जितनी कहिए मिर्च-खटाई डाल दूं।’’ रामभरोसे ने कहा। वह मजाक कर रहा था।
‘‘हां, वही...वही...’’ राधे भाई ने कलम हिलाकर कहा और सामने फैले कागजों में देखने लगे। रामभरोसे ने अपनी कमीज की जेब से एक मुड़ातुड़ा कागज निकाला और मुझे देकर बोला-‘‘जब भैया खाली हों तो यह उन्हें दे देना। यह कविता मैंने आज ही लिखी है।’’ वह चला गया। मैंने पीला-सा मुड़ा हुआ कागज खोला तो मुझे छींकें आने लगीं। कागज खोलते ही मसालों की खुशबू फैल गई। राधे भाई भी छींकने लगे। मैं पढ़ने लगा-
49

दो -दो चांद हमारे घर में
नकली कौन, असली कौन
कौन बताए, कौन सिखाए
दो-दो चाँद हमारे घर में
आगे और भी कुछ लिखा था, जो पढ़ने में नहीं आ रहा था। राधे भाई ने रामभरोसे की कविता वाला कागज मेरे हाथ से लिया और पढ़ने लगे फिर बोले-‘‘यह कविता! अगर इसे छापूंगा तो चल चुकी मेरी पत्रिका। वह कागज फाड़ने को हुए तो मैंने कहा-‘‘भैया, रामभरोसे नाराज हो जाएगा। रोज बाबूजी को सलाम करता है।’’
‘‘तो बाबूजी से ही छपा ले अपनी कविता, फिर फाड़ते-फाड़ते रुक गए। सुजानी को पुकार कर बोले-‘‘भाभी, घर में मसाले हैं?’’
‘‘खटाई, नमक है. मिर्च और हल्दी खत्म है।’’ सुजानी ने कहा।
राधे भाई ने एक कागज पर लिखा मिर्च और हल्दी। बोले-‘‘जा रामभरोसे को दे दे। पूछे तो कह देना कविता भैया पढ़ रहे हैं। तुम ये मसाले दे दो। पैसे मांगे तो कह देना भैया से लेना।’’
मैं कागज लेकर रामभरोसे की दुकान पर चला गय। मुझे देखते ही बोला-‘‘क्या कहा भैया ने।’’
मैंने कहा-‘‘कविता अच्छी है। मेरे घर में दो-दो चांद...’’
रामभरोसे हंसने लगा। ‘‘तो तुमने पढ़ी मेरी कविता।’’
‘‘हां, भैया ने भी पढ़ ली है। अच्छी है।’’ फिर राधे भाई का लिखा कागज उसके हाथ में थमा दिया। उसने झट से दो पुडि़यां बांधकर मुझे दे दी। बोला-‘‘भैया से कहना अपनी पत्रिका में मेरी कविता जरूर छापें।’’ मैंने दोनों पुडि़यां लाकर सुजानी को दे दीं।
बाहर से राधे भाई की आवाज आई-‘‘देखा कमाल। अभी तो पत्रिका छपी भी नहीं है।’’
अब हर शाम को हमारे घर में नए-नए लोग आते थे।
राधे भाई मुझसे कहते थे-‘‘छत पर चादर बिछा दे।’’ चादर बिछाकर मुझे पानी ले जाना पड़ता। सबको देना पड़ता। कुछ लोग कोट-पैंट में आते तो कुछ कुरते-धोती में।
सब पता नहीं क्या-क्या कहते थे। राधे भाई सबके सामने कागज पर लिखे नाम पढ़ते और राय पूछते।
50

मैं भी एक तरफ खड़ा रहता। नामों पर चर्चा होती। सब अलग-अलग बातें कहते। सब नाम आते पर जूही का नाम एक बार भी चर्चा में नहीं आया। क्या ये लोग जूही से चिढ़ते थे?
एक शाम छत पर लोग बैठे थे। बातें हो रही थीं। कई लोग कह रहे थे इंद्रधनुष नाम रखो। उसमें सात रंग होते हैं।
राधे भाई चुप थे। उन्होंने पास में बैठे आदमी के कान में कुछ कहा। वह खड़ा हुआ, उसने कहा-‘‘इंद्रधनुष भी कोई नाम है। पत्रिका निकलते ही पिट जाएगी। इसका नाम धरती होना चाहिए था। मेरी माँ  धरती मां-सबकी प्यारी धरती मां।’’ वह गाने लगा।
‘‘खामोश।’’ यह उसकी आवाज थी जिसने इंद्रधनुष नाम लिखा था। ‘‘बात करने की तमीज नहीं है और...’’
बस इतना कहते ही वे दोनों आपस में लड़ने लगे। राधे भाई चुप खड़े हंस रहे थे। इंद्रधनुष और धरती नीचे पड़े एक दूसरे से जूझ रहे थे। तभी जलती मोमबत्ती चादर पर गिर गई। चादर जलने लगी। ‘‘आग-आग’’ सब चीखने लगे। मैंने पानी की बाल्टी उठाकर चादर पर डाल दी। आग बुझ गई। सब तेजी से उतर गए। अब छत पर सिर्फ मैं और राधे भाई थे। जलने के कारण चादर में बहुत बड़ा छेद हो गया था। जगह-जगह कागज पड़े हुए थे।
राधे भाई ने कहा-‘‘चादर उठा ले। झाड़ू लाकर साफ कर दे। आज तो मूड खराब कर दिया इन्होंने। अब किसी को नहीं बुलाऊंगा। मैं खुद ही नाम रख दूंगा। पंकज। हां, यही नाम ठीक रहेगा।‘’
मैंने कहा-‘‘जूही रख लो न। अच्छा नाम है।’’
‘‘जूही का फूल छोटा होता है। जल्दी मुरझाता है। पंकज ही ठीक है।’’ राधे भाई ने फैसला सुना दिया और छत से उतर गए। छत पर भीगी और जली चादर तथा भीगे कागज पड़े थे। ‘‘मैं भी नहीं करूंगा सफाई। अगर जूही नाम रखोगे तभी करूंगा काम।’’ कहता हुआ मैं भी नीचे आ गया। मुझे लग रहा था राधे भाई अगर मेरी बात नहीं सुनेंगे तो नाराज हो जाऊंगा।
51

पर ऐसा नहीं हुआ। दो दिन बाद एक आदमी एक बोर्ड लेकर आया। उस पर बड़े अक्षरों में लिखा था-पंकज। उसने और राधे भाई ने मिलकर बोर्ड को छज्जे के बाहरी हिस्से पर कीलों से ठोक दिया। ‘‘पंकज अच्छा नाम है। वैसे तेरी पसंद का नाम जूही भी अच्छा है पर किसी ने मुझसे पंकज ही रखने को कहा है। नाराज न हो। मैं तेरी कविता जरूर छापूंगा ।’’ उन्होंने मेरा कंधा थपथपा दिया। मेरा गुस्सा जाता रहा। मैंने अपने रूमाल से पंकजके बोर्ड को खूब रगड़-रगड़ कर साफ किया। बोर्ड पर रूमाल फिराते हुए मुझे बहुत अच्छा लग रहा था। क्या राधे भई को पता था कि मैं भी कविता और गीत लिखता था? मेरे पास एक छोटी-सी डायरी थी, उसके कई पन्ने भर दिये थे मैंने। लेकिन क्या राधे भाई को वे पसंद आएंगी? मैं रामभरोसे की तरह उन्हें मिर्च खटाई मुफ्त देता शायद मेरी कविता भी छप जाती।
जब से पंकजनाम का बोर्ड छज्जे पर लगा था हमारे घर में बहुत लोग आने लगे थे। कई बार लड़कियां भी आती थीं। एक अलमारी में रचनाएं रखी जाती थीं। राधे भाई ने कहा-‘‘तू जब चाहे उनमें से पढ़ सकता है। मुझे बता सकता है कि कौन रचना अच्छी है या बुरी।’’
मैं अलमारी में रखी रचनाएं निकालकर पढ़ता। कई बातें समझ न आतीं। अब रात-भर मीटिंगें होती थीं बाबूजी के कमरे में। रात को बाबूजी होते ही नहीं थे। सुजानी ने भी बताया था कि वे हर शाम जुबैदा के घर जाते थे।
एक शाम एक परदे वाला तांगा हमारे छज्जे के नीचे आकर रुका। मेरा कलेजा धड़धड़ करने लगा। शायद जुबैदा आई थी। हो सकता था वह जूही को भी साथ लेकर आई हो, पर बाबूजी तो घर में थे नहीं। दो औरतें आईं। वे कोई और ही थीं। वे सुंदर थी। राधे भाई उन्हें कमरे में ले आए। मुझसे बोले-‘‘पानी ला। भाभी से चाय बनाने को कह दे।’’
मुझे बुरा लगा, क्या मैं नौकर था जो हर किसी को पानी और चाय दूं। राधे भाई की यह बात मुझे बुरी लगती थी। जब से पंकजपत्रिका का काम शुरू हुआ था उन्होंने जैसे मुझे नौकर बना लिया था। मैं अंदर जाकर सुजानी के पास बैठ गया। वह चावल साफ कर रही थीं। मैंने न पानी दिया, न चाय। न जाने क्यों मुझे लग रहा था कि वे दोनों जुबैदा के घर से आई हैं। मैंने छज्जे से झांककर देखा तांगे वाला वही था जो मुझे सेब के बाजार से रावतपाड़े लेकर आया था उस दिन।
52

मैं कमरे से निकल कर नीचे चला गया। राधे भाई उन दोनों लड़कियों से बातें कर रहे थे। उन्होंने मेरी ओर ध्यान नहीं दिया। मैं नीचे जाकर तांगे के पास खड़ा हो गया। तांगे वाले ने एक बार मेरी ओर देखा पर शायद पहचाना नहीं। वह हाथ में घास लेकर घोड़े के खिला रहा था। मैं खड़ा सोचता रहा-क्या मुझे जूही के बारे में पूछना चाहिए। पता नहीं यह क्या सोचे। लेकिन और कोई तरीका भी तो नहीं था। मैंने पूछा-‘‘तुम जूही को जानते हो? अब उसकी तबियत कैसी है ?’’
वह मेरी ओर देखता रहा, पर बोला कुछ नहीं। मैंने फिर पूछा तो उसने कहा-‘‘जूही, कौन जूही। किसकी बात कर रहे हो लड़के?’’
‘‘याद है जूही ने तुमसे कहा था और तब तुम मुझे यहां छोड़कर गए थे। मैं उस जूही की बात कर रहा हूं। वह कैसी है?’’
‘‘वहां कोई जूही नहीं है। तुम किसकी बात कर रहे हो। मैं किसी जूही को नहीं जानता।’’
मैं समझ गया वह सरासर झूठ बोल रहा है। भला यह कैसे हो सकता है कि उसे जूही के बारे में पता न हो। जूही ने खुद पूछने पर अपना नाम बताया था। वह भला झूठ क्यों बोलेगी मुझसे?
तांगे वाले ने कहा-‘‘किस-किस का नाम याद रखें। वहां लड़कियां आती-जाती रहती हैं। हर रोज नया चेहरा।’’
लेकिन जूही ने जुबैदा को अपनी मां बताया था। तब ऐसा कैसे हो सकता था। शायद यह मुझे बताना न चाहता हो। हो सकता है जूही ज्यादा बीमार हो। मैं आगे न सोच सका। बीमार ही तो होगी। जब कोई उसका ध्यान न रखे तो ऐसा ही होगा। भला कौन दवाई देगा उसे? पर मैं कैसे जान सकता था। तांगेवाला मुझे कुछ बताने को ही तैयार नहीं था।
‘‘क्या तुम मुझे जुबैदा के घर ले जाओगे, मुझे जूही से मिलना है।’’
‘‘नहीं मेरे पास टैम नहीं है। जाओ भागो।’’ कहकर वह तांगे में जा बैठा।
अब मैं कुछ नहीं कर सकता था।
53

क्या मैं जूही से कभी नहीं मिल सकूंगा! मैं चुपचाप ऊपर चला आया। मुझे देखकर राधे भाई ने कहा-‘‘हम ताज जा रहे हैं। आज पूरनमासी है। आज की रात ताजमहल की खूबसूरती बहुत बढ़ जाती है। वहां कविताएं पढ़ी-सुनी जाएंगी।’’
‘‘मैं भी चलूं।’’ मैंने पूछा।
‘‘नहीं आज तेरा काम नहीं है, फिर कभी ले चलूंगा।’’ उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा और जीने से उतर गए। तांगे वाला उन्हें लेकर चला गया। तब सांझ ढल रही थी। आकाश में परिंदे शोर मचा रहे थे। मुझे अच्छा नहीं लग रहा था। मैं सोच रहा था कि जल्दी से जल्दी दिल्ली कैसे जा सकता हूं। अब आगरे में था ही क्या?
पंकज पत्रिका निकली तो हमारे घर में जैसे मेला लग गया। पत्रिका के कवर पेज पर पीले व लाल रंग में एक लड़की का चित्र बना था जो कमल का फूल लिए तालाब के किनारे बैठी थी। उसमें कविताएं-कहानियां व लेख छपे थे। गांधीजी का बहुत बड़ा फोटो छपा था। मैं सारा दिन पत्रिका को हाथ में लिए बैठा रहा। उस पर हाथ फिरा-फिराकर देखता रहा। पत्रिका लेकर छज्जे में पंकज के बोर्ड के पास खड़ा रहा। उस दिन मैंने रूमाल को पानी में भिगोकर पंकजके बोर्ड को खूब चमकाया। वह राधे भाई की पत्रिका थी। हमारी पत्रिका थी और हां अंदर के पृष्ठों पर राधे भाई का फोटो भी छपा था। वह खड़े होकर कविता पढ़ रहे थे।
ऊपर वाली छत पर एक बड़ी दावत दी गई थी। राधे भाई ने बताया था उसमें शहर के बड़े-बड़े लेखक आए थे, पर मैं जानता नहीं था किसी को। सब बड़ी-बड़ी बातें कर रहे थे।
और फिर मेरा मनचाहा हो गया-दिल्ली से नानी का भेजा खत आया था। पड़नानी बीमार थीं और मुझे देखना चाहती थीं। सब उन्हें संपत कहते थे।
बाबूजी ने राधे भाई से कहा, ‘‘तुम इन दोनों को दिल्ली छोड़ आओ।’’
मैं तांगे की पिछली सीट पर सुजानी के साथ बैठा था। क्या ऐसा हो सकता था कि हमारा तांगा जुबैदा के घर के सामने से गुजरे और छज्जे पर जूही खड़ी हो। शायद मुझे वह पहचान जाए। शायद क्यों, वह जरूर ही पहचान लेगी मुझे। हो सकता है कि मिलने के लिए नीचे आ जाए। मैं गरदन बाहर निकाल कर बाजार में इधर-उधर देखता रहा। तांगा खट-खट करता हुआ तेजी से बढ़ा जा रहा था। आगरा पीछे छूटा जा रहा था, और भी कुछ था। पहले मन था कि उड़कर दिल्ली पहुंच जाऊं लेकिन अब...अब... पर हमें जाना ही था।     ( क़िस्त – चार- समाप्त )                                                                              ( आगे और है )    
54







कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें